थोड़े में संतोष करना उस जमाने की सोच है जब राजा दिग्विजय करता था और प्रजा के पांव बंधे थे। मजबूरी से उपजी उस सोच को आज ढोते रहने का कोई मतलब नहीं हैं। आज हम सभी राजा हैं तो खुद को बांधे क्यों?और भीऔर भी