चौथी अर्थव्यवस्था का दावा ध्वस्त, छोड़ चुकी सरकार विकसित भारत का दावा!

करीब नौ महीने अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) ने 14 अप्रैल 2025 को जारी वर्ल्ड इकनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट में अनुमान जताया था कि कैलेंडर वर्ष 2025 या वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का जीडीपी 4.187 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है जो जापान के अनुमानित जीडीपी 4.186 ट्रिलियन डॉलर से थोड़ा ज्यादा होगा। इस तरह भारत तब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। उस समय सरकार के तमाम मंत्रियों और भाजपा नेताओं के साथ ही नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रह्रमण्यम तक ने ढोल बजा दिया कि भारत जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। यही नहीं, अभी दस दिन पहले 29 दिसंबर 2025 को सरकारी प्रचारक पीआईबी ने आईएमएफ की उसी रिपोर्ट का हवाला देते हुए ऐलान कर दिया कि भारत 4.18 अरब डॉलर के जीडीपी के साथ जापान को पीछे छोड़ दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और अगले ढाई-तीन साल में 2030 तक 7.3 ट्रिलियन के जीडीपी के साथ जर्मनी को हटाकर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। तब कई न्यूज़ चैनलों से लेकर स्वतंत्र पत्रकारों तक ने पीआईबी के प्रचार पर यकीन कर डंका बजा दिया।

लेकिन बुधवार, 7 जनवरी को जब सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने चालू वित्त वर्ष 2025-26 के जीडीपी का पहला अग्रिम अनुमान जारी किया कि भारत के चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने से सारे दावे ध्वस्त हो गए। इन अनुमान के मुताबिक देश का जीडीपी चालू वित्त वर्ष 2025-26 में वर्तमान मूल्यों पर 357.14 लाख करोड़ रुपए के स्तर तक पहुंच सकता है। यह पिछले वित्त वर्ष 2024-25 के जीडीपी 330.58 लाख करोड़ रुपए से 8% अधिक है। दूसरे शब्दों में वित्त वर्ष 2025-26 में जीडीपी की नॉमिनल विकास दर 8% रहने का पहला अग्रिम अनुमान है। बता दें कि 1 फरवरी 2025 को प्रस्तुत चालू वित्त वर्ष 2025-26 के बजट में जीडीपी की नॉमिनल विकास दर का अनुमान 10.1% रखा गया था।

पहले अग्रिम अनुमान के मुताबिक वर्तमान मूल्यों पर देश का जीडीपी 2025-26 में 357.14 करोड़ रुपए रहता है तो यह प्रति डॉलर 89.94 रुपए की मौजूदा विनिमय दर पर 3.97 लाख करोड़ या 3.97 ट्रिलियन डॉलर निकलता है जो कहीं से भी 5.50% छलांग लगाकर 4.187 ट्रिलियन डॉलर पर नहीं पहुंच सकता। इसलिए आईएमएफ का भारत को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का अनुमान धराशाई हो जाता है। साथ ही सरकारी प्रचारक पीआईबी से लेकर प्रधानमंत्री और उनके तमाम मंत्रियों व भाजपा नेताओं के सारे दावे भी अब हवा में उड़ गए हैं। उनका सच अब कागज के नकली फूलों से ज्यादा कुछ नहीं रह गया है।

यही नहीं, 29 दिसंबर 2025 को जारी पीआईबी की विज्ञप्ति में एक और चौंकानेवाला खुलासा किया गया है, जिस पर अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया है। इसमें कहा गया है, “भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और इस गति को बनाए रखने के लिए पूरी तरह तैयार है। अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष, 2047 तक उच्च मध्य-आय का स्तर हासिल करने के लक्ष्य के साथ, देश आर्थिक विकास, संरचनात्मक सुधारों और सामाजिक प्रगति की मजबूत नींव पर आगे बढ़ रहा है।” यही बात अंग्रेज़ी की विज्ञप्ति में यूं कही गई है, “India is among the world’s fastest-growing major economies and is well-positioned to sustain this momentum. With the ambition of attaining high middle-income status by 2047– the centenary year of its independence- the country is building on strong foundations of economic growth, structural reforms, and social progress.”

आखिर केंद्र सरकार की आवाज़ में यह बदलाव क्यों? क्या इसकी खास वजह आईएमएफ द्वारा भारत के राष्ट्रीय खातों पर उठाई गई आपत्ति है? इसे दूर करने के लिए तो सरकार ने फैसला कर ही लिया है कि 12 फरवरी 2026 को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) और 27 फरवरी 2026 की जीडीपी की नई सीरीज जारी होगी। दोनों का आधार वर्ष 2011-12 से बढ़ाकर 2022-23 कर दिया जाएगा। औद्योगिक मूल्य सूचकांक (आईआईपी) की संरचना भी बदल जाएगी। फिर मोदी सरकार द्वारा विकसित भारत के नारे को छोड़कर 2047 तक उच्च मध्यम-आय के स्तर तक उतरने के पीछे क्या मजबूरी है? अगर सरकार को अपने हवा-हवाई नारे पर सचमुच शर्म आ रही होती तो वह पिछले महीने 18-19 दिसंबर को हड़बड़ी में संसद के दोनों सदनों से पास कराए गए रोज़गार गारंटी के बिल के नाम में जबरन विकसित भारत क्यों जोड़ती!

हम मान सकते हैं कि मोदी सरकार को यकीन हो चला है कि वो 2047 तक किसी भी हालत में विकसित भारत का लक्ष्य न तो हासिल कर सकती है और न ही लोग इसके इस नारे में अब यकीन करे रहे हैं। इसीलिए उसे लगा कि एक कदम पीछे हट जाना ज्यादा सही होगा। अवाम में पक्की धारणा बन गई है कि 2047 तक भारत को विकसित देश बना देने का वादा खुद-ब-खुद नहीं पूरा होने जा रहा। ऐसा इसलिए क्योंकि इसका वास्ता जीडीपी के आकार से नहीं, बल्कि प्रति व्यक्ति आय से है। अभी हमारी प्रति व्यक्ति आय 2024-25 में वर्तमान मूल्यों पर 2,38,270 रुपए या 2649.21 डॉलर रही है। साल 2047 तक विकसित देश बनने के लिए भारत की प्रति व्यक्ति आय 13,935 डॉलर से ज्यादा होनी चाहिए। इसके लिए तब तक मुद्रास्फीति को डिस्काउंट करने के बाद हर साल आम लोगों की औसत आय करीब 7.84% की रफ्तार से बढ़नी होगी। यह रफ्तार हासिल करना आज की तारीख में सरकार समर्थक अर्थशास्त्रियों तक को असंभव लगता है।

गौरतलब है कि साल 2024 तक की नवीनतम स्थिति के मुताबिक दुनिया में जिन देशों की प्रति व्यक्ति आय 13,935 डॉलर से ज्यादा है, उन्हें विश्व बैंक ने उच्च आय या विकसित देशों की श्रेणी में रखा है। दरअसल, उसने 1135 डॉलर या इससे कम प्रति व्यक्ति आय वाले देशों को निम्न आय, 1136 से 4495 डॉलर प्रति व्यक्ति आय वाले देशों को निम्न मध्यम आय, 4496 से 13,935 डॉलर प्रति व्यक्ति आय वाले देशों को उच्च मध्यम आय और 13,935 डॉलर से अधिक प्रति व्यक्ति आय वाले देशों को उच्च आय या विकसित देशों की श्रेणी में रखा है। विश्व बैंक की ताज़ा सूची के मुताबिक अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस, जापान, दक्षिण कोरिया, नीदरलैंड, न्यूज़ीलैंड व ऑस्ट्रेलिया जैसे देश उच्च आय या विकसित देशों की श्रेणी में आते हैं, जबकि मेक्सिको, ब्राज़ील, चीन, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, मलयेशिया व मालदीव उच्च मध्यम आय के देशों की श्रेणी में आते हैं। वहीं भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, वियतनाम व म्यांमार निम्न मध्यम आय की श्रेणी में आनेवाले देश हैं। साफ है कि मोदी सरकार अब 2047 तक भारत को अमेरिका, रूस, जापान व जर्मनी जैसा विकसित देश नहीं, बल्कि चीन, ब्राज़ील व दक्षिण अफ्रीका के स्तर तक पहुंचाने की बात करने लगी है।

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले 15 अगस्त 2022 को लालकिले की प्राचीर से बोलते हुए आज़ादी की 75वां सालगिरह पर ‘अमृत महोत्सव’ की शुरुआत की घोषणा की थी। उन्होंने अपने संबोधन में पांच प्रणों की बात कही थी। इसी क्रम में उन्होंने पहली बार आज़ादी के सौ साल पूरा होने पर 2047 में विकसित भारत बनाने का नारा उछाला था। वे इस नारे को सरकार के हर कार्यक्रम से लेकर चुनावी सभाओं में उछालते रहे हैं। लेकिन अब लगता है कि यह नारा खोखला झुनझुना बन चला है। इसीलिए उनकी सरकार भारत को 2047 तक उच्च आय वाला विकसित देश बनाने के बजाय उच्च मध्य-आय का देश बनाने की बात कहने लगी है। हालांकि सरकार ने जिस high middle-income status की बात कही है, वैसी कोई श्रेणी विश्व बैंक की सूची में नहीं है। विश्व बैंक ने इसके बजाय Upper middle income की श्रेणी रखी है।

मोदी सरकार जिस तरह विकसित भारत का नारा छोड़कर पतली गली से उच्च मध्यम-आय के स्तर तक पहुंची है, उसकी एक प्रमुख वजह हो सकता है यह हो कि उसके विकास के गुब्बारे की हवा निकलती जा रही है। उसके आर्थिक सेनापतियों ने डिफ्लेटर के खेल से भले ही जीडीपी की रीयल विकास दर को डूबने से बचा लिया हो, लेकिन चालू वित्त वर्ष 2025-26 में पहली तिमाही से ही जीडीपी की नॉमिनल विकास दर के घटते जाने ने अर्थव्यवस्था की सेहत पर सवालिया निशान लगा दिया है। चालू वित्त वर्ष 2025-26 में बजट में जीडीपी की अनुमानित नॉमिनल विकास दर 10.1% रखी गई थी। लेकिन जून 2025 की तिमाही में जीडीपी की नॉमिनल विकास दर 8.8% और सितंबर 2025 की तिमाही में 8.2% रही है। अब वित्त वर्ष 2025-26 में जीडीपी के पहले अग्रिम अनुमान में यह दर 8% रहने की बात कही गई है। इसमें मात्र 0.6% का डिफ्लेटर घटाकर जीडीपी की रीयल विकास दर के 7.4% रहने का दावा किया जा रहा है। यह जीडीपी के मौजूदा आधार वर्ष 2011-12 के बाद से अब तक का न्यूनतम डिफ्लेटर है। आईएमएफ इस तरह के डिफ्लेटर पर सवाल उठा चुका है। देश के भीतर के अर्थशास्त्री भी इस पर सवाल उठा रहे हैं। देखना यह है कि 12 फरवरी को मुद्रास्फीति और 27 फरवरी को आधार वर्ष 2022-23 कर देने के बाद जीडीपी की जो नई सीरीज जारी होती है, उसके बाद क्या तस्वीर उभरकर सामने आती है। क्या वह देश की हकीकत के अनुरूप होगी या वहां से हवा-हवाई दावों की नई सीरीज शुरू हो जाएगी?

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