टैपरिंग का सीधा-सा मतलब होता है अर्थव्यवस्था को दिए जा रहे वित्तीय प्रोत्साहन से हाथ खींचना। अमेरिका में फेडरल रिजर्व की योजना है कि वह इस साल मार्च तक सिस्टम में बॉन्ड खरीदकर डॉलर डालने के कार्यक्रम  में कटौती या टैपरिंग शुरू कर देगा। उसके बाद वह खरीदे गए बॉन्डों को निकालने लगेगा। इससे बॉन्ड के भाव घटेंगे और उसी अनुपात में उन पर यील्ड या ब्याज की दर बढ़ने लगेगी जिससे बढ़ती मुद्रास्फीति को रोकने मेंऔरऔर भी

अमेरिका में अप्रैल 2020 में कोविड का प्रकोप शुरू होने के समय से वहां का केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व बॉन्ड खरीदकर सिस्टम में डॉलर झोंक रहा है। नतीजतन, उसकी बैलेंस शीट 12 जनवरी 2022 तक 8788.30 अरब डॉलर की हो चुकी थी। इसमें 1425 अरब डॉलर का इजाफा बीते साल 2021 में हुआ है। फेड सरकारी बॉन्ड, बंधक रखी प्रतिभूतियों से जुड़े बॉन्ड और कॉरपोरेट बॉन्ड खरीदकर सिस्टम में डॉलर डालता है। इससे वित्तीय बाज़ार में नकदीऔरऔर भी

नए साल के दो हफ्तों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने उम्मीद से उलट हमारे शेयर बाजार में खरीदने से ज्यादा बेचने का सिलसिला जारी रखा है, जबकि इसी दौरान अमेरिका के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व ने टैपरिंग या बॉन्ड बेचकर सिस्टम से धन निकालने के बजाय बॉन्ड खरीदकर सिस्टम में लगभग 31 अरब डॉलर डाले हैं। बॉन्ड खरीदने का मतलब है फेडरल रिजर्व की बैलेंस शीट का बढ़ जाना, जिसका सीधा रिश्ता है भारतीय शेयर बाज़ारऔरऔर भी

किसी-किसी दिन होता यह है कि तमाम सूचकांकों के सारे के सारे प्रमुख स्टॉक्स गिरे रहते हैं। पूरे बाज़ार में पस्ती छाई रहती है। ऐसे माहौल में हम कहां से स्टॉक्स चुन सकते हैं? दिक्कत यह है कि रिटेल ट्रेडर को उन्हीं स्टॉक्स में ट्रेड करना चाहिए जिनमें बढ़ने की भरपूर गुंजाइश हो। उनका रिस्क प्रोफाइल ऐसा है कि उन्हें शॉर्ट सेलिंग से परहेज़ करना चाहिए। ऐसे में एनएसई में सूचकांकों के पेज़ पर तीसरे सेगमेंट मेंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में हमारा या किसी भी बाहर वाले का ‘ज्ञान’ मोटामोटी ही होता है। बाज़ार की बारीकियां हर ट्रेडर को खुद अपने अभ्यास से पकड़नी होती है। फिर यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि बाज़ार में इस समय खेल क्या चल रहा है। मसलन, फिलहाल बाज़ार में बड़ी ऊंच-नीच चल रही है। समूचे बाज़ार में रुख बढ़ने का होता है। लेकिन निफ्टी और सेंसेक्स को चंद स्टॉक्स के दम पर दबा दिया जाता है। इसमेंऔरऔर भी

लम्बी व मध्यम अवधि, मतलब कुछ महीने और साल-दो साल से बढ़ने का रुख। लेकिन फिलहाल गिरावट। ऐसे स्टॉक्स को भी ट्रेडिंग के लिए पकड़ने की अलग विद्या है जो बताती है कि इन स्टॉक्स में प्रोफेशनर ट्रेडरों व संस्थाओं की खरीद कहां से शुरू हो सकती है और कहां तक जाने के बाद वे इनसे बाहर निकल सकते हैं। इसे डिमांड और सप्लाई का नियम कहते हैं। यह विद्या टेक्निकल एनालिसिस के फंडे से बाहर है।औरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग के लिए सही स्टॉक्स वे हैं जो किसी न किसी सूचकांक में शामिल हैं। कोई कितना भी कहे, कैसी भी जानदार टिप्स दें, हमें इनसे बाहर झांकना भी नहीं चाहिए। इनमें भी सबसे ऊपर है निफ्टी-50 जिसमें सेंसेक्स के सभी 30 स्टॉक्स शामिल हैं। इसके बाद आते हैं पहले निफ्टी नेक्स्ट-50, निफ्टी-100, निफ्टी-200 और निफ्टी-500 अंत में। अमूमन ट्रेडिंग के लिए इससे बाहर देखने की ज़रूरत नहीं होती। इन सूचकांकों में शामिल स्टॉक्सऔरऔर भी

जहां कम पता लगाया जा सकता है और अनिश्चितता ज्यादा होती है, वहां ज्यादा रिस्क होता है और जहां ज्यादा पता लगाया जा सकता है, वहां अनिश्चितता कम होने के साथ ही रिस्क भी घटता जाता है। इस पैमाने पर कसें तो लम्बे समय के निवेश में ज्यादा जानकारी के बल पर रिस्क घटाया जा सकता है। सवाल उठता है कि शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में रिस्क को न्यूनतम कैसे किया जाए क्योंकि हर कामयाब ट्रेडर काऔरऔर भी

दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं मुद्राओं के जरिए आपस में जुड़ी रहती हैं और उनका संतुलन बनता-बिगड़ता रहता है। बीते 21 साल में विश्व अर्थव्यवस्था में अमेरिकी डॉलर का हिस्सा लभभग 12% घट गया है। यूरो का हिस्सा भी 28% से घटकर 20% पर आ गया है। फिर बाकी हिस्सा किसके पास है। दुनिया के वित्तीय बाज़ार का लगभग 5% ब्रिटिश पाउंड, 5% जापानी येन और मात्र 2.6% चीनी युआन के पास है। साफ है कि दुनिया की दूसरीऔरऔर भी

नए साल में एफपीआई की खरीद बढ़ने के साथ ही शेयर बाज़ार में तेज़ी का सुरूर चढ़ने लगा। उधर अमेरिका का सिस्टम में नोट छापकर डॉलर डालने और मुद्रास्फीति को थामने के लिए उसे वापस खींचने का क्रम जारी है। इस तरह वह अपनी अर्थव्यवस्था को गरम-ठंडा करता रहता है। लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था उसकी इस हरकत से प्रभावित होती है। वैसे, दुनिया के वित्तीय बाज़ार में अमेरिकी डॉलर का हिस्सा लगातार घटता जा रहा है। साल 2000औरऔर भी