दुनिया भर का वित्तीय प्रवाह जहां से चलता है, उस अमेरिका ने ब्याज दर बढ़ा दी तो बाकी देशों में भी यह सिलसिला शुरू हो गया है। इसके अगले ही दिन ब्रिटेन के केंद्रीय बैंक, बैंक ऑफ इंग्लैंड ने ब्याज दर बढ़ा दी। हांगकाग ने भी ब्याज दर बढ़ा दी। दरअसल, दुनिया का हर प्रमुख देश ऐसा करेगा। नहीं तो वहां का धन निकलकर अमेरिका की तरफ भागेगा। अपने यहां भारत में रिजर्व बैंक ने 22 मईऔरऔर भी

मुद्रास्फीति जब 40 सालों के उच्चतम स्तर 7.9% पर पहुंच गई हो, तब अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व को सांकेतिक ब्याज दर की रेंज को बढ़ाकर 0.25-0.50% करना ही था। मार्च 2020 में कोरोना महामारी के बाद से वहां इसे शून्य से 0.25% रखा गया था ताकि अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिलता रहे। लेकिन बुधवार को भारतीय समय के मुताबिक रात 11 बजे फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर बढ़ाने का फैसला कर लिया। इस साल फेडरल ओपनऔरऔर भी

विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) दुनिया भर की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से उसी देश में निवेश करते हैं जहां कम रिस्क में ज्यादा रिटर्न पाने की भरपूर संभावना होती है। भारत यकीनन दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ सकनेवाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। लेकिन बढ़ती मुद्रास्फीति, महंगे कच्चे तेल पर निर्भरता, बेलगाम राजकोषीय़ घाटे और अटके आर्थिक सुधारों ने भारत की संभावनाओं को कमज़ोर किया है। क्या एफआईआई इस वजह से भारत से निकल रहे हैं? वेऔरऔर भी

यूं तो किसी भी देश में घुसे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का स्वभाव ही है फटाफट मुनाफा कमाकर निकल जाना। लेकिन उनके द्वारा भारतीय शेयर बाज़ार में लगातार छह महीने से बेचते जाना और दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा निकाल लेना अपने-आप में चौंकानेवाली घटना है। आखिर जिस भारत को लेकर वे दशकों से आशावान रहे हैं, वहां से इस कदर भागने की वजह क्या है? क्या उनकी आशा निराशा में बदल गई है और वे ‘बुलिश’औरऔर भी

विदेशी संस्थागत या पोर्टफोलियो निवेशक पिछले छह महीनों से लगातार भारतीय शेयर बाज़ार में बेचे जा रहे हैं। यह सिलसिला तब से शुरू हुआ है, जब से 19 अक्टूबर 2021 को निफ्टी-50 ने 18,604.65 अंक छूकर अब तक का ऐतिहासिक शिखर बनाया। उस हफ्ते से दिसंबर के अंत तक एफआईआई या एफपीआई ने हमारे शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट से 99,461 करोड़ रुपए की शुद्ध निकासी की। सेबी की तरफ से व्यवस्थित डेटा रखनेवाली संस्था एनएसडीएल केऔरऔर भी

सवाल उठता है कि शेयर बाज़ार में बने आज के हालात में क्या किया जाए? ट्रेडर या निवेशक का रास्ता क्या है? अगर ट्रेडिंग करना चाहते हैं तो सीधा-सा जवाब है कि ट्रेडिंग में ऐसी ऊंच-नीच बराबर आती रहती है। यह  बाज़ार का मूल स्वभाव है। इसलिए ट्रेडिंग में सफलता या बाज़ार से नियमित कमाई के लिए आपको अपने माफिक अच्छा-सा ट्रेडिंग सिस्टम विकसित करना होगा और लगातार सच्चाई पर उसे कसते और आजमाते हुए बराबर अपग्रेडऔरऔर भी

बाज़ार को दो साल से चढ़ाए जा रहे देश के प्रोफेनशल निवेशक हों, संस्थाएं या विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) हो, वे इधर जमकर मुनाफावसूली कर रह हैं तो यह एकदम स्वाभाविक है। जो भी ज्यादा कमा लेता है, उसे सब गंवा देने की चिंता सताती है। वो भी तब जब तरफ अनिश्चितता के घने बादल छाते जा रहे हों। बाहर ही नहीं, अब तो देश के भीतर भी पांच राज्यों के ताज़ा विधानसभा चुनावों ने अनिश्चितता बढ़ाऔरऔर भी

बकने को कोई भी कुछ बक सकता है। लेकिन जिन तथाकथित विशेषज्ञों या एक्सपर्ट्स को आप हर दिन बिजनेस चैनलों पर देखते है कि वे भी गारंटी नहीं दे सकते कि आगे शेयर बाज़ार का क्या हाल होगा। रूस-यूक्रेन का युद्ध तो तात्कालिक मामला है। इससे पहले भी अमेरिका समेत सारी दुनिया में बढ़ती मुद्रास्फीति और उसे समतल करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने की तलवार लटकी हुई थी। यह काम इसी मार्च महीने में होना है।औरऔर भी

बाज़ार में इस समय इतनी उथल-पुथल चल रही है कि किसी भी स्टॉक के भाव का अनुमान लगाना लगभग असंभव है। लम्बे समय से दबा चला आ रहा किसी अच्छी कंपनी का शेयर अचानक 5-6% उछलता है तो लगता है कि अब इसने तेज़ी की राह पकड़ ली। लेकिन अगले ही दिन उसके पुराने निवेशक मुनाफावसूली कर डालते हैं तो शेयर फिर धड़ाम हो जाता है। ट्रेडरों का रवैया बेहद छोटा हो गया है। वे मुनाफे काऔरऔर भी

बाज़ार गिर रहा है। गिरता ही जा रहा है। कहा जा सकता कि या तो यह करेक्शन है या तेज़ी के दौर का अंत और मंदी की शुरुआत। अगर करेक्शन है तो फिलहाल समझदारी इसी में है कि बाज़ार का तमाशा दूर खड़े रहकर बाहर से देखा जाए। नहीं तो अगर रिस्क लेने की भरपूर क्षमता हो, तरीका पता हो तो बाज़ार को शॉर्ट किया जाए, डेरिवेटिव सेगमेंट में शॉर्ट सेलिंग की जाए। हम सभी इंसान हैंऔरऔर भी