अगर देश ही नहीं, पूरी दुनिया में सर्वे कराया जाए कि बिजनेस न्यूज़ चैनल देखनेवाले कितने लोग ट्रेडिंग से कमाते हैं तो यकीन मानिए कि नतीजा होगा: कोई नहीं, शत-प्रतिशत घाटा खाते हैं। इसका एक कारण यह है कि न्यूज़ जब तक इन चैनलों तक पहुंचती है, तब तक वो बेअसर होकर उल्टी दिशा पकड़ चुकी होती है। दूसरा यह कि यहां न्यूज़ को सनसनीखेज़ बनाने के लिए अतिरंजित कर दिया जाता है। अब बुधवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

जान-पहचान बहुतों से होती है। लेकिन गहरी दोस्ती कम ही लोगों से होती है और गाढ़े-वक्त में गहरे दोस्त ही काम आते हैं। यही बात शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग पर भी लागू होती है। जान-पहचान तो आपकी तमाम शेयरों से होनी चाहिए। पर कुछ शेयरों से इतनी तगड़ी पहचान होनी चाहिए कि आप उनकी हर चाल-ढाल और नाज़-नखरे से वाकिफ हों। ट्रेडिंग पचास में नहीं, इन्हीं पांच-दस शेयरों में कीजिए तो मुनाफा कमाएंगे। अब वार मंगल का…औरऔर भी

निवेश के लिए भावों का चार्ट देखना ज़रूरी नहीं। लेकिन ट्रेडिंग करनेवालों का काम इसके बिना नहीं चलता। बहुत से लोग शेयरखान में एकाउंट खुलवाते हैं ताकि उसके साथ उन्हें ट्रेड टाइगर सॉफ्टवेयर मुफ्त में मिल जाए। चार्ट पर टेक्निकल एनालिसिस के सारे संकेतक, जो बीत चुका है, जो निर्जीव है, उसे दिखाते हैं। असली चुनौती जो अदृश्य है, सौदों के पीछे जो लोग है, उन्हें देखने की है। आगे की दृष्टि के साथ करते हैं आगाज़…औरऔर भी

देश के कोने-कोने में छोटे-छोटे कस्बों व शहरों के लोग रिस्क तो लेते है। तभी तो स्पीक एशिया या सारधा जैसी फर्में हज़ारों-हज़ार करोड़ जुटा लेती हैं। लेकिन सरकार अंदर से नहीं चाहती कि लोग ऐसा रिस्क लें जिसमें उनका और देश के औद्योगिक विकास, दोनों का भला हो क्योंकि ऐसा होगा तो डाकघर व बैंकों में रखी हमारी बचत का बड़ा हिस्सा उसे सस्ते कर्ज के रूप में नहीं मिलेगा। आज तथास्तु में एक मिड-कैप कंपनी…औरऔर भी

आदर्श स्थिति वो होती कि हर कोई जीतता, मुनाफा कमाता और कोई न हारता, कहीं कोई हैरान-परेशान ट्रेडर नहीं होता। लंबे निवेश में हर किसी के जीतने की स्थिति होती है। लेकिन ट्रेडिंग में तो कतई नहीं। इसलिए जबरदस्त होड़ से भरे इस बाज़ार में आप अपनी गाढ़ी कमाई लगाने से अच्छी तरह समझ लीजिए कि करने क्या जा रहे हैं। जान लें कि आपके सामने उल्टा ट्रेड कौन कर रहा है। अब आगाज़ करें शुक्रवार का…औरऔर भी

भावों में छिपा है कंपनी का सारा हाल, उसी तरह जैसे नाड़ी खोल देती है शरीर का सारा राज़। लेकिन कुशल वैद्य ही नाड़ी की धड़कन पढ़ सकता है तो भावों का चार्ट पढ़ने के लिए भी चाहिए विशेष दृष्टि। सबसे खास है यह पकड़ना कि किसी वक्त बड़े निवेशकों/संस्थाओं की तरफ से आनेवाली मांग और सप्लाई का ठीक-ठीक संतुलन क्या है? यह पकड़ लिया तो समझिए, हाथ लग गई बाज़ार की नब्ज। अब गुरुवार की दृष्टि…औरऔर भी

इतने पर खरीदो, इतने पर बेचो और इतने पर स्टॉप-लॉस लगाओ! बाई-सेल, टार्गेट, स्टॉप-लॉस! क्या ट्रेडिंग के लिए इतना भर जान लेना पर्याप्त है? ज्यादातर लोगों का जवाब होगा हां, क्योंकि वे खुद यही करते हैं। इससे ज्यादा से उनका मतलब नहीं होता। हिंदी, मराठी या गुजराती भाषी लोगों को भी इतनी अंग्रेज़ी आती है तो उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि टिप अंग्रेज़ी में है या उनकी अपनी भाषा में। आंखों पर ऐसी पट्टी क्यों? अब आगे…औरऔर भी

मुनाफे का मौका ताड़ने में लोगों को ज्यादा वक्त नहीं लगता। हम हिंदुस्तानी इस मायने में खटाक से जोखिम उठाने को तैयार हो जाते हैं। पहले इंट्रा-डे ट्रेडिंग में लाखों ट्रेडरों ने हाथ जला डाला। अब हर कोई निफ्टी के ऑप्शंस व फ्यूचर्स से सम्मोहित है। सामान्य से सामान्य लोग जो बस गिनती-पहाड़ा तक जानते हैं, डेरिवेटिव जैसे जटिल प्रपत्रों में हाथ डाल रहे हैं। बस ऊपर-ऊपर जान लिया। बाकी रामनाम सत्य है। अब वार मंगल का…औरऔर भी

जब कोई घटना घट जाती है तो उसकी अनंत व्याख्याएं की जा सकती हैं। अपने-अपने हिसाब से तथ्य चुनो और बताते जाओ कि ऐसा इसलिए और वैसा उसलिए हुआ। लेकिन शेयरों के रोजमर्रा के भावों में धांधली जमकर होती है। इसे कोई भी नकार नहीं सकता। सूचकांकों पर नज़र रखिए। आप पाएंगे कि अक्सर ढाई बजे के बाद खटाक से बाज़ार की दिशा पलट दी जाती है। कल भी ऐसा ही हुआ। आखिर क्या थी इसकी वजह…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश और ट्रेडिंग में ज़मीन-आसमान का फर्क है। धैर्य व शांत चित्त दोनों में ज़रूरी है। लेकिन दोनों का टाइमफ्रेम भिन्न है। लंबे समय में कोई भी शांत और धैर्यवान हो सकता है। पर घंटे-दो घंटे या हफ्ते-दस दिन में भावनाओं के दबाव में आए बगैर ट्रेडिंग में ज्यादा कमाई और कम नुकसान के अवसर पकड़ना आसान नहीं। हंस मछली पकड़ लेता है, पर कौआ कांव-कांव करता रह जाता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी