हम राकेश झुनझुनवाला या एफआईआई नहीं जो अपनी खरीद से किसी शेयर को चढ़ा दें। न ही हम बैंकर, ब्रोकर या कंपनी प्रवर्तक हैं कि अंदर की खबरें घोषित होने से पहले हमारे पास पहुंच जाएं। हमारी सीमा है कि भावों की भाषा ही ट्रेडिंग का हमारा एकमात्र औजार है। इसे पढ़ने में माहिर हो जाएं और प्रायिकता के मद्देनज़र रिस्क-रिटर्न का सामंजस्य बैठा लें तो जीत हमारी। अन्यथा हारना हमारी नियति है। अब हफ्ता बजट का…औरऔर भी

दीर्घकालिक निवेश में देखते हैं कि कंपनी के भावी कैश-फ्लो के आधार पर उसके शेयर का अंतर्निहित मूल्य कितना है। अगर बाज़ार भाव उससे कम तो निवेश बनता है। नहीं तो उससे दूर रहना भला। दिक्कत यह है कि ज्यादातर शेयर अभी अंतर्निहित मूल्य से काफी ऊपर चल रहे हैं। जब सस्ते थे तो हमारे बताने के बावजूद किसी ने पूछा नहीं। अब सब दौड़े पड़े हैं। भागमभाग के बीच तथास्तु में मैराथन की सामर्थ्य वाला स्टॉक…औरऔर भी

हम हिंदुस्तानियों जैसा उद्यमी सारी दुनिया में शायद ही कहीं मिले। हम हर चीज़ में असली काम का जुगाड़ निकाल लेते हैं। शायद आप जानते ही होंगे कि पंजाब के ढाबों और बड़े घरों में वॉशिंग मशीन से लस्सी बनाई जाती है। कुछ यही हाल शेयर बाज़ार में ऑप्शंस/फ्यूचर्स ट्रेडिंग का है। महज 12वीं पास, गणित में कमज़ोर, अंग्रेज़ी में तंग। फिर भी ज़नाब कॉल और पुट में सिद्धहस्त हैं। करते नमन इसका, बढ़ें शुक्रवार की ओर…औरऔर भी

ट्रेडिंग में कोई एक रणनीति हर वक्त काम नहीं करती। जनवरी में स्ट़ॉक चुनने से लेकर ट्रेडिंग का जो तरीका था, वह चार महीने बाद मई तक आते-आते बदल गया। अब मोदी सरकार का पहला आम बजट आने में महज एक हफ्ता बचा है तो इन दिनों की ट्रेडिंग रणनीति अलग होगी। बदलते हालात में जो स्थाई चीज़ है, वो है लचीलापन। हमारी ट्रेडिंग मानसिकता का जरूरी तत्व होना चाहिए लचीलापन। अब करें शुरू गुरु का अभ्यास…औरऔर भी

हम सभी व्यक्तिगत ट्रेडर हैं। शेयर बाज़ार के घराती नहीं, बराती हैं। हम खुद कुछ नहीं बनाते। दूसरों के बनाए पर खेलते हैं। इन दूसरों में 9275 ब्रोकर, 51707 सब ब्रोकर, 1709 विदेशी संस्थागत निवेशक व उनके 6391 सब एकाउंट, 50 म्यूचुअल फंड, 207 वेंचर कैपिटल फंड और बीसियों बैंकों के साथ हज़ारों प्रोफेशनल ट्रेडर व एचएनआई शामिल हैं। इन सभी की मौजूदगी को ध्यान में रखते हुए ही हमें ट्रेडिंग करनी चाहिए। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

बाजार में एक उन्माद-सा छाया हुआ है। लोग खरीदने का फैसला कर चुके हैं। बस, वजह की तलाश है। सेंसेक्स साल के पहले छह महीने में 20.21% बढ़ गया, जबकि इस दौरान अमेरिका का बाज़ार 6.1% और जर्मनी का बाज़ार 2.8% ही बढ़ा है। विदेशी निवेशक भारत में 1000 करोड़ डॉलर से ज्यादा झोंक चुके हैं। बीएसई-500 के करीब 100 मिड व स्मॉलकैप स्टॉक्स पिछले छह महीने में दोगुने हो चुके हैं। ऐसे में बढ़ें ज़रा संभलकर…औरऔर भी

ट्रेडिंग एक हुनर है, जो जन्मजात नहीं, बल्कि सीखा जाता है। हरेक कामयाब ट्रेडर को निरपवाद रूप से सीखने के दौर से गुजरना पड़ता है। लेकिन अच्छी बात यह है कि इस धंधे में कोई एंट्री-बैरियर नहीं। आपकी पृष्ठभूमि क्या है, उम्र क्या है, अनुभव है कि नहीं, इससे फर्क नहीं पड़ता। कोई भी शख्स अध्ययन, मनन व अभ्यास से कामयाब ट्रेडर बन सकता है, बशर्ते सही सोच और पूरा समर्पण हो। चलिए, बढ़ें सोमवार की ओर…औरऔर भी

शेयर बाज़ार के निवेश के रिस्क को भगवान भी नहीं मिटा सकता। कंपनी का मालिक तक नहीं जानता कि कौन-सी आकस्मिकता उसके सालों से जमे धंधे को ले बीतेगी। इसलिए यहां से लक्ष्य पूरा होते ही धन निकाल कर ज़मीन, सोने या एफडी जैसे सुरक्षित माध्यम में लगा दें। दूसरे, ज्यादा घाटा भी न सहें। कोई शेयर 25% गिर गया तो बेचकर निकल लें क्योंकि उतना भरने के लिए उसे 33.33% बढ़ना पड़ेगा। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार में गिनती के दो-चार लाख लोग ही होंगे जो लगाकर लंबे समय के लिए भूल जाते हैं और कंपनी के साथ निवेश का खिलना देखते हैं। बाकी तो झट लगाया और कमाया की नीति अपनाते हैं। अभी यही रुख हावी है। मजबूत व सुरक्षित कंपनियों से निकाल कर रिस्की मिड कैप व स्मॉल कैप या कमज़ोर कंपनियों में लगाया और उठाया। मुनाफावसूली की और फिर सुरक्षित स्टॉक्स खरीद लिए। अब हफ्ते का अंतिम ट्रेड…औरऔर भी

हम शेयर बाज़ार को ललचाई नज़रों से देखते हैं। हमें लगता है, वहां खटाखट नोट बनाए जा सकते हैं। लेकिन सोचिए! ये नोट छापता कौन है? रिजर्व बैंक। ज्यादा नोट जब कम स्टॉक्स का पीछा करते हैं तो बाज़ार चढ़ जाता है। इसी तरह के चक्र में अमेरिका में जनवरी 2013 से अब तक S&P-500 सूचकांक 30% बढ़ा है। न कमाया, न बचाया। 4% ब्याज पर कर्ज उठाकर लगाया और शुद्ध 26% बनाया। अब गुरुवार का मर्म…औरऔर भी