अचंभे की बात यह है कि डेरिवेटिव्स या फ्यूचर्स व ऑप्शंस सौदों में देशी और विदेशी निवेशक संस्थाओं का योगदान 10% से भी कम है। हर दिन वहां होने वाले औसतन दो-ढाई लाख करोड़ रुपए के वोल्यूम का लगभग 90% हिस्सा रिटेल या अमीर निवेशकों और प्रॉपराइटरी ट्रेडरों व ब्रोकर फर्मों का है। सट्टेबाज़ी की मानसिकता इसकी एक वजह है। दूसरी अहम वजह यह है कि इन सौदों पर कम टैक्स लगता है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार में कैश सेगमेंट का वोल्यूम पिछले दस सालों में 15% सालाना की चक्रवृद्धि दर से बढ़ा है, जबकि डेरिवेटिव सेगमेंट 67% की दर से। हमारा डेरिवेटिव बाज़ार कैश बाज़ार का 16 गुना हो चुका है। यह दक्षिण कोरिया के बाद दुनिया का सबसे बड़ा डेरिवेटिव बाजार है। निफ्टी इंडेक्स ऑप्शंस का बाज़ार तो दुनिया में सबसे बड़ा है, एस एंड पी 500 इंडेक्स के ऑप्शंस से भी बड़ा। आखिर क्यों? फिलहाल सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बाज़ार में सक्रिय असरदार खिलाड़ियों की चाल को हमें वस्तुगत तरीके से समझना होता है। उनके नाम भले ही जाहिर न हों, लेकिन उनके सौदे बाज़ार बंद होते ही भावों के चार्ट पर अपनी निशानदेही छोड़ जाते हैं। बाज़ार की यही खासियत है। वहां बहुत कुछ छिपा नहीं रहता। लेकिन दिक्कत यह है कि हम समझने में शॉर्टकट अपनाते हैं और अक्सर अपने मन की बातें चार्ट पर थोप देते हैं। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हर दिन ट्रेडर के सामने यह जानने की चुनौती रहती है कि भाव आज या आगे कहां जा सकते हैं। इसमें पक्का कुछ भी नहीं, प्रायिकता है, कयासबाज़ी है। जाहिर है कि भाव कोई भगवान नहीं, इंसान ही खोलते और चढाते-गिराते हैं। कौन हैं वे खिलाडी जो बाज़ार की दशा-दिशा तय करते हैं? कभी-कभी एचएनआई, अक्सर संस्थाएं। ऐसे में असली सूत्र यह है कि इनकी संभावित चाल को पहले से कैसे भांपा जाए। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

जीवन ही नहीं, बाज़ार में भी कल के बारे में पहले से कुछ भी पक्का नहीं। वहां बहुत कुछ अज्ञात है। इसलिए उससे निपटने की चुनौती है। और, चुनौती से निपटने के लिए रिस्क लेना पड़ता है। इसमें टिप्स नहीं, सही विश्लेषण से मदद मिलती है। लेकिन रिस्क से निपटने की अंतिम तैयारी अपनी होनी चाहिए। ऐसा कतई न करें कि फायदा तो अपना और घाटा तो औरों पर ज़िम्मेदारी डाल दी। अब आजमाएं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

टिप्स लेकर कमाने की सोचनेवाले ट्रेडरों की फितरत एक जैसी होती है। बिजनेस चैनलों व अखबारों से धोखा खाने के बाद वे टिप्स के धंधेबाज़ों के शरणागत हो जाते हैं। वहां से गाहे-बगाहे कमा लिया तो अपनी पीठ थपथपाते हुए दूसरों को टिप्स बांटने लग जाते हैं। लेकिन जैसे ही गच्चे पर गच्चा खाते हैं तो बाज़ार से लेकर टिप्स के धंधेबाज़ों तक को गरियाने लगते हैं। टिप्स नहीं, यहां सिस्टम ज़रूरी है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाना कतई आसान नहीं। जहां देश-विदेश के धुरंधर डटे हों, जिनके पास लाखों नहीं, करोड़ों की पूंजी हों, जहां आईआईएम ही नहीं, हार्वर्ड, कोलम्बिया व लंदन तक के एमबीए रिसर्च करते हों, वहां कोई अनाड़ी सोचे कि 25,000 रुपए सालाना की ट्रेडिंग टिप्स लेकर कमा लेगा तो उसे बाद में रोना ही पड़ेगा। टिप्स देनेवाले उसकी लालच को भुना लेते हैं और वो सारी पूंजी गंवा बैठता है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

तूफान आने पर सभी भागते हैं। यह बड़ी सहज सामान्य सोच है। लेकिन जो तूफान आने से पहले सुरक्षित ठौर पकड़ लेते हैं, वही जीतते हैं क्योंकि उनकी सोच उन्नत है। अतीत से वर्तमान को परखकर जो भविष्य की आहट सुन लेते हैं, वही बाज़ार से कमाते हैं। हमेशा याद रखें कि शेयर बाज़ार में हर गिरा हुआ स्टॉक सस्ता नहीं होता, न ही हर चढ़ा हुआ स्टॉक महंगा होता है। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

औरों पर बीस पड़ने के लिए आपके पास ऐसी अंतर्दृष्टि होनी चाहिए जो सब के पास नहीं है। जटिल हालात में आपकी प्रतिक्रिया अलग होनी चाहिए। अति-उत्साह या अफरातफरी की हालत में आपका बर्ताव औरों से एकदम भिन्न होना चाहिए। सच है कि सफलता के लिए आपका सही होना ज़रूरी है। पर, सही होना ही अपने आप में पर्याप्त नहीं। आपको बाज़ार से कमाने के लिए दूसरों से ज्यादा सही होना पड़ेगा। अब चलाएं बुध की बुद्धि…औरऔर भी

ट्रेडिंग में उतरे हैं तो जाहिरा तौर पर मकसद औसत नहीं, बल्कि उससे ज्यादा रिटर्न कमाना होगा। इसके लिए आपको औसत से बेहतर ट्रेडर होना पड़ेगा, जिसके लिए आपकी सोच उन सभी से बेहतर होनी चाहिए। आज तो हर ट्रेडर के पास कंप्यूटर है, इंटरनेट से मिल सकनेवाली सारी सूचनाएं हैं। बहुतों के पास संभव है कि आपसे बेहतर सॉफ्टवेयर हो। फिर कौन-सी चीज़ है जिसमें आप उन पर भारी पड़ सकते हैं। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी