क्या फंडामेंटल्स से ट्रेडिंग पर फर्क पड़ता है? बाजार की दशा-दिशा सटीक मालूम हो तो क्या इतने से ही ट्रेडिंग से कमाई की जा सकती है? इसका स्पष्ट जवाब है: नहीं। कारण, ट्रेडिंग में कमाई का वास्ता महज बाज़ार या स्टॉक के भावों की दिशा से नहीं, बल्कि माकूल समय पर घुसने और बाहर निकलने से है। ट्रेन्ड जोर पकड़े, उससे पहले उसे पकड़ना और ट्रेन्ड पलटे, उससे पहले निकलना ज़रूरी है। अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

नोटबंदी को अब व्यापक स्तर पर एक नाकाम आर्थिक प्रयोग माना जाने लगा है। इससे काला धन, आतंकवाद, जाली नोट व भ्रष्टाचार में से किसी भी समस्या का हल नहीं निकला है। उलटे, इससे अर्थव्यवस्था में आधे से ज्यादा का योगदान दे रहे सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योगों की कमर टूट गई है। इनमें काम करनेवाले करीब 27 लाख मजदूर बेरोज़गार हो गए हैं। देश के आर्थिक फंडामेंटल कमज़ोर पड़ गए हैं। अब देखें गुरु की दशादिशा…औरऔर भी

बात बड़ी साफ है। भले ही तमाम जानकार कह रहे हों कि नोटबंदी से भारतीय जीडीपी एक-डेढ़ प्रतिशत घट सकता है। लेकिन इस माहौल में भी ट्रेडिंग से कमाने के मौके निकल सकते हैं। बाज़ार का हाल तो निफ्टी और सेंसेक्स जैसे सूचकांक बताते हैं। लेकिन उनसे बाहर सैकड़ों ऐसे शेयर हैं जो स्वतंत्र चाल से चलते हैं। उनकी अलग चाल को पकड़ लिया जाए तो बाज़ार में बराबर कमाया जा सकता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

आप यह जानकर अचंभे में पड़ जाएंगे कि नोटबंदी के बाद कई शेयर हैं जो मात्र महीने भर के अंदर 45% से लेकर 90% से ज्यादा बढ़ चुके हैं। ऐसे पांच शेयर हैं – टान्ला सोल्यूशंस, आईटीआई, बारट्रॉनिक्स, आर एस सॉफ्टवेयर और टीवीएस इलेक्ट्रॉनिक्स। इन सभी का वास्ता आईटी उद्योग में हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर बनाने से है। माना जा रहा है कि नोटबंदी से इन्हें फायदा होगा तो इनके शेयर उछल गए। अब पकड़ें मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

नोटबंदी को लागू हुए चालीस दिन बीत गए। प्रधानमंत्री मोदी का दावा है कि पचास दिन में सब ठीक हो जाएगा। फिलहाल लोगों में सर्कुलेट हो रहे 500 और 1000 रुपए के करीब-करीब सारे पुराने नोट बैंकों में वापस आ चुके हैं। बचे-खुचे अगले दस दिन में आ जाएंगे। लेकिन उन नोटों की भरपाई नहीं हुई। इसलिए जगह-जगह से उपद्रव की खबरें आने लगी हैं। फिर भी ट्रेडर के लिए मौके कम नहीं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

स्टैंडर्ड डेविएशन की गणना में फंसने के बजाय हम शेयरों के भाव के रोजाना या साप्ताहिक चार्ट पर गौर कर लें तो उसका उतार-चढ़ाव हमें साफ दिख जाता है। ट्रेडिंग के लिए वे शेयर ही सबसे सही होते हैं जिनमें उतार-चढ़ाव ठीकठाक रहता है। मंथर गति से सीमित रेंज में चलते शेयरों में ट्रेडिंग से कमाना बहुत मुश्किल होता है। इसीलिए अक्सर निवेश और ट्रेडिंग के लिए मुफीद शेयर अलग-अलग होते हैं। अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सवाल यह है कि निवेश या ट्रेडिंग से जुड़े रिस्क की गणना कैसे करें? पहली बात यह कि यह रिस्क लॉटरी या पोकर खेलने से एकदम भिन्न है। यहां बिजनेस में लगी एक कंपनी है जिसके शेयर का भाव अंततः उसके धंधे की सेहत से निर्धारित होता है। वो अपने अंतर्निहित मूल्य से निश्चित रेंज में ऊपर-नीचे होता है। इसे उसकी चंचलता या वोलैटिलिटी कहते हैं जिसे स्टैंडर्ड डेविएशन से नापा जाता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग करते वक्त हमें अनिश्चितता के तत्व को बराबर याद रखना चाहिए। इसलिए इसमें वही धन लगाना चाहिए जो डूब भी जाए तो हमारी रोजमर्रा की ज़िंदगी पर कोई असर न पड़े। शायद यही समझ है जिसकी वजह से मध्यवर्ग के आम लोग शेयर बाज़ार से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं। लेकिन दिमाग का सही इस्तेमाल करें तो सुविचारित रिस्क लेने में कोई हर्ज नहीं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अनिश्चितता एक तरह की आकस्मिकता है, रोकना तो दूर, जिसका पहले से पता लगा पाना भी संभव नहीं है। इसके हमले से बचने के लिए आज बीमा ही एक सहारा है जिसकी बाकायदा कीमत चुकानी पड़ती है हर साल प्रीमियम के रूप में। वित्तीय बाज़ार में बड़े निवेशक डेरिवेटिव सौदों का सहारा लेकर कैश सेगमेट के सौदों को अनिश्चितता की मार से बचाते हैं। लेकिन छोटे निवेशकों के पास ऐसा कवच नहीं है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

दुनिया हर दिन छोटी होती जा रही है। कभी चीन, कभी जापान तो कभी यूरोप व अमेरिका की आर्थिक राजनीतिक हलचल भारत जैसे बाज़ारों को प्रभावित करती रहती है। ग्लोबीकरण ने कम से कम सभी देशों के वित्तीय बाज़ारों को एक तार में बांध दिया है। किसी एक देश की अनिश्चितता से अन्य देशों की अनिश्चितता नत्थी हो गई है। इसे हम रोक तो नहीं सकते। लेकिन इसके रिस्क को बांध सकते हैं। अब सोम का व्योम…औरऔर भी