शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग करते वक्त हमें अनिश्चितता के तत्व को बराबर याद रखना चाहिए। इसलिए इसमें वही धन लगाना चाहिए जो डूब भी जाए तो हमारी रोजमर्रा की ज़िंदगी पर कोई असर न पड़े। शायद यही समझ है जिसकी वजह से मध्यवर्ग के आम लोग शेयर बाज़ार से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं। लेकिन दिमाग का सही इस्तेमाल करें तो सुविचारित रिस्क लेने में कोई हर्ज नहीं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अनिश्चितता एक तरह की आकस्मिकता है, रोकना तो दूर, जिसका पहले से पता लगा पाना भी संभव नहीं है। इसके हमले से बचने के लिए आज बीमा ही एक सहारा है जिसकी बाकायदा कीमत चुकानी पड़ती है हर साल प्रीमियम के रूप में। वित्तीय बाज़ार में बड़े निवेशक डेरिवेटिव सौदों का सहारा लेकर कैश सेगमेट के सौदों को अनिश्चितता की मार से बचाते हैं। लेकिन छोटे निवेशकों के पास ऐसा कवच नहीं है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

दुनिया हर दिन छोटी होती जा रही है। कभी चीन, कभी जापान तो कभी यूरोप व अमेरिका की आर्थिक राजनीतिक हलचल भारत जैसे बाज़ारों को प्रभावित करती रहती है। ग्लोबीकरण ने कम से कम सभी देशों के वित्तीय बाज़ारों को एक तार में बांध दिया है। किसी एक देश की अनिश्चितता से अन्य देशों की अनिश्चितता नत्थी हो गई है। इसे हम रोक तो नहीं सकते। लेकिन इसके रिस्क को बांध सकते हैं। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

बाज़ार में कोई सामान खरीदने जाते हैं तो उसे सस्ते में खरीदने की कोशिश करते हैं। दुकानदार से यह नहीं कहते कि 24,000 का यह टीवी मुझे पसंद है और मैं इसे 30,000 रुपए में खरीदने को तैयार हूं। लेकिन शेयर बाज़ार में हम ऐसा ही बेवकूफाना बर्ताव करते हैं। शेयर का भाव बढ़ जाने पर हमें तसल्ली होती है, तब हम उसे खरीदते हैं। यह ट्रेडिंग में विफलता का दूसरा कारण है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में नाकामी की पहली वजह यह है कि किताबों, वेबसाइटों व क्लासेज़ में हमें पांरपरिक टेक्निकल एनालिसिस सिखाई जाती है। बताया जाता है कि जब हर कोई खरीद रहा हो, तब खरीदो। जब सभी बेच रहे हों, तब बेचो। हमें भीड़ की भेड़चाल में धकेल दिया जाता है। जब भाव चढ़ चुका होता है, खबर जज्ब हो चुकी होती है, तब हम सौदा करते हैं तो फायदा कैसे होगा? अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

इतना ज्ञान बिखरे होने के बावजूद अधिकांश लोग अपना वित्तीय लक्ष्य हासिल करना तो दूर, उसके पास तक नहीं फटक पाते। आखिर क्यों? कामायनी में जयशंकर प्रसाद लिखते हैं: ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की; एक दूसरे से मिल न सकें, यह विडम्बना है जीवन की। विफलता की एक वजह निश्चित रूप से ज्ञान और कर्म का फासला है। लेकिन ट्रेडिंग में इसकी दो खास वजहें हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

कयासबाज़ी से कोई मुक्त नहीं। वित्तीय बाज़ार में दांव लगाने को बहुत कुछ है तो कयास लगानेवाले बहुतेरे हैं। व्यक्ति ही नहीं, कंपनियां, बैंक व संस्थाएं तक अंदाज़ लगाती रहती है। इस बाज़ार में कमाना इतना आसान लगता है कि हर कोई छलांग लगाने को आतुर है। उनकी इस लालच का फायदा उठाने के लिए सैंकड़ों किताबें व हज़ारों इंटरनेट वेबसाइट सामने आ चुकी हैं। फिर भी बाज़ी हाथ से निकल जाती है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

बाज़ार आगे कहां जानेवाला है, इस पशोपेश में रोजमर्रा ट्रेड करने वालों से लेकर लंबे समय के निवेशक तक बराबर लगे रहते हैं। अगली दो तिमाहियों में भारत का जीडीपी क्या होने जा रहा है? नोटबंदी उसे कितनी चोट पहुंचाएगी? अमेरिक का फेडरल रिजर्व 13-14 दिसंबर को ब्याज दर कम से कम 0.25% तो बढ़ा ही देगा! इन सारी चीज़ों पर हमारा कोई वश नहीं। फिर भी हम जमकर कयासबाज़ी करते रहते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

हमें धंधेबाज़ नहीं बनना है। न ही उनके जितना नीचे गिरना आम हिंदुस्तानी के लिए आसान है। हमें बुद्धत्व हासिल करने वाला ऐसा प्रोफेशनल ट्रेडर बनना है जिसे अपनी सीमाओं और वित्तीय बाज़ार के स्वरूप को लेकर किसी किस्म का कोई मुगालता न हो। हम एक बार में एक या आधा कदम ही चलें। न डरें, न दुस्साहस करें। न शिकार बनें, न किसी का शिकार करें। किताबों और व्यवहार से सीखते जाएं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

अपने बाज़ार में दो तरह के प्रोफेशनल ट्रेडर सक्रिय हैं। एक वे जो वित्तीय बाजार के अब तक ढूंढे गए नियमों की गहरी अंतर्दृष्टि रखते हैं, जिन्होंने अभ्यास से एक तरह का बुद्धत्व हासिल कर लिया है और कम से कम जोखिम में अधिक से अधिक फायदा कमाने के सौदे चुनते हैं। दूसरे तरह के प्रोफेशनल ट्रेडर धंधेबाज़ है। वे प्रवर्तकों और ऑपरेटरों से मिलकर झुनझुना बजाते हैं और गंदा खेल खेलते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी