गणतंत्र अपनी मूल भावना के साथ काम करे और निर्वाचित प्रतिनिधि बेलगाम न हो जाएं, इसके लिए संविधान बनाया जाता है। हर मसले पर जबरस्त बहस के बाद संविधान बनाया जाता है। फिर भी कुछ मसले छूट या नए मुद्दे सामने आ जाएं तो संविधान में संशोधन का अधिकार संसद के पास होता है। साथ ही न्यायपालिका संविधान की रक्षा का काम करती है। यह सैद्धांतिक व्यवस्था है। लेकिन व्यवहार क्या है? अब आजमाएं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

चुने हुए प्रतिनिधियों की सरकार गणतंत्र की ऊपरी अवधारणा है। मूल है सत्ता की लगाम आमजन के हाथों में होना जो निश्चित अंतराल, जैसे भारत में पांच साल पर वोट से पहले चुने गए प्रतिनिधियों को हटा सकता है। लेकिन दो चुनावों के बीच के पांच सालों में आमजन असहाय रहता है और तब उसके वोटों से जीते प्रतिनिधि ही उसके माई-बाप बन जाते हैं। उन्हें ‘वापस बुलाने का अधिकार’ मिलना ज़रूरी है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

देश इस हफ्ते 67वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। 26 जनवरी गुरुवार को पड़ रही है, इसलिए जनवरी के डेरिवेटिव सौदों की एक्सपायरी इस बार एक दिन पहले बुधवार, 25 जनवरी को होगी। यह बाज़ार की तकनीकी बात है। पर इस बहाने हमें गणतंत्र की मूल भावना को आत्मसात करने की कोशिश कर लेनी चाहिए। गणतंत्र में सत्ता किसी एक व्यक्ति नहीं, बल्कि आम लोगों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथ में होती है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में केवल चार संभावनाएं होती हैं: बड़ी जीत, छोटी जीत, छोटा घाटा और बड़ा घाटा। अगर कोई ट्रेडर बड़े घाटे से बचता रहे तो बाकी तीन स्थितियों में पूरी तरह सही-सलामत रहता है। उसकी ट्रेडिंग पूंजी सलामत रहती है और वो अपने सिस्टम व अनुशासन के बल पर ज्यादा नहीं तो बराबर थोड़ा-बहुत मुनाफा कमाता रहता है। अच्छे रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात वाले सौदे चुने तो उसका मुनाफा बढ़ जाता है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

मानकर चलें कि वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में घाटे से कभी नहीं बचा जा सकता। लेकिन हम उसे कम से कम ज़रूर रख सकते हैं। इसके लिए रिस्क को न्यूनतम करना होता है। प्रोफेशनल ट्रेडर ऐसा करने के वास्ते स्टॉप-लॉस ही नहीं,  पोजिशन साइज़िंग जैसे कई तरीके अपनाते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वे न तो घाटे से विचलित होते हैं और न मुनाफा कमाने पर कुलांचे भरते हैं। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

इंसान होने के नाते हमारा सहज स्वभाव है कि हम हमेशा सही होना चाहते हैं और गलत होने से नफरत करते हैं। लेकिन ट्रेडिंग और निवेश की दुनिया में यह सहज स्वभाव नहीं चलता क्योंकि इसमें गलत होना और घाटा लगना पक्का है। सबसे अच्छे ट्रेडर भी समय-समय पर घाटा खाते रहते हैं। सामान्य ट्रेडर और उनमें अंतर बस इतना है कि वे घाटे को न्यूनतम और मुनाफे को अधिकतम रखना जानते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अतिविश्वास जीवन के हर क्षेत्र के लिए बुरा है। लेकिन वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग के लिए तो यह बेहद खतरनाक है। इससे आपमें सुरक्षा का झूठा भाव आ जाता है। गुमान हो जाता है कि बाज़ार पर आपकी राय हमेशा सही बैठती है। इस गफलत में आप अपनी औकात से ज्यादा बड़े सौदे कर बैठते हैं। नतीजतन भयंकर घाटे के शिकार या दिवालिया तक हो जाते हैं। इस अहंकार से बचना ज़रूरी है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग एक ऐसा बिजनेस है जो आपके आत्मसम्मान को हर दिन चुनौती देता है। बाज़ार चंद मिनट में आपको गलत साबित कर सकता है। आप उससे तर्क-वितर्क भी नहीं कर सकते। आपकी निजी धारणा या अनुमान हो सकता है। पर, बाज़ार उसकी रत्ती भर परवाह नहीं करता। उसे जो करना है, वो ही करेगा। इसलिए आप लंबे समय तक सफलता से ट्रेड करना चाहते हैं तो विनम्रता बड़ी ज़रूरी है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

बाज़ार में सौदे छिपाकर नहीं किए जाते। बैंक, बीमा या देशी-विदेशी संस्थाओं के सारे सौदे सरे-बाज़ार होते हैं। उनकी हर हरकत स्टॉक के भावों में दर्ज होती है। जिनके पास सही दृष्टि होती है, वे यह सच भावों के चार्ट पर अलग-अलग टाइमफ्रेम और गिने-चुने इंडीकेटरों की मदद से देख लेते हैं। बाकी लोग टिप्स खोजते हैं कि कौन-सा फंड, एफआईआई व बड़ा खिलाड़ी क्या खरीदने या बेचने जा रहा है। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हर कोई हर काम नहीं कर सकता। न ही सभी सूचनाएं हर किसी के काम की होती हैं। शेयर बाज़ार के ट्रेडर के लिए सबसे अहम सूचना है सूचकांक या स्टॉक के भाव। हर खबर का असर उनमें समाहित होता है। यह काम करवाती हैं बड़ी-बड़ी रिसर्च फर्में व संस्थान। खबरों व विश्लेषण को पचाकर बैंक, बीमा कंपनियों व म्यूचुअल फंड जैसी संस्थाएं खेल कर चुकी होती हैं। इसे समझना हमारा काम है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी