जिस चीज़ के चाहनेवाले बढ़ जाते हैं तो उसके भाव चढ़ जाते हैं। यह बात शेयर बाज़ार पर भी लागू होती है। हां, यह छोटे या रिटेल निवेशकों की नहीं, बड़ों की खरीद असरकारी होती है। ट्रेडिंग में सफलता की कुंजी है कि इसे कैसे पकड़ा जाए। कुछ लोग इसके लिए शेयरों के फ्यूचर्स के ओपन इंटरेस्ट को आधार बनाते हैं। वे फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस से बाहर के शेयरों को हाथ नहीं लगाते। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

कंपनियों में पांच-दस नहीं, बल्कि साल-दो साल के लिए भी निवेश करनेवालों की संख्या घटती जा रही है क्योंकि अधिकांश लोगों के लिए यह घाटे का सौदा साबित हुआ है। लगाया था सौ रुपए, दस साल में घटकर रह गया आठ रुपया। इसलिए आम निवेशक ट्रेडर बनते गए। उसमें भी कोई सिरा नहीं मिला तो मूल शेयरों के डेरिवेटिव्स, फ्यूचर्स व ऑप्शंस में खेलने लगे और कम से भयंकर जोखिम में धंस गए। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

हर समय, हर जगह लोगबाग न्यूनतम मेहनत में अधिकतम नोट बनाने की फिराक में लगे रहते हैं। वित्तीय बाज़ार के आम ट्रेडर इसमें औरों से चार कदम आगे हैं। शेयर बाज़ार में पेनी स्टॉक्स का झांसा बरकरार है। अब डेरिवेटिव ट्रेडिंग का नया दौर चल निकला है तो सभी उसके पीछे भाग रहे हैं। इसमें भी फ्यूचर्स नहीं, ऑप्शंस के पीछे क्योंकि वो ऊपर-ऊपर काफी सस्ता नज़र आता है। यह कितना सही है? अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

समय के साथ हम अपने तौर-तरीकों को अपग्रेड न करें तो पीछे रह जाएंगे। वित्तीय बाजार की ट्रेडिंग में भी विदेशी संस्थाओं व हेज फंडों के आने के साथ सिस्टम में बराबर नयापन आता जा रहा है। अर्थकाम अपना ट्रेडिंग सिस्टम अद्यतन बनाने में लगा है। इस काम में दो हफ्ते लग जाएंगे। इसलिए यह कॉलम अब अगली बार 20 फरवरी को आएगा। वर्तमान सब्सक्राइबरों का सब्सक्रिप्शन दो हफ्ते बढ़ा दिया गया है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शायद आपने भी गौर किया होगा कि अधिकांश शेयरों ने साल भर पहले फरवरी महीने में अपना न्यूनतम स्तर पकड़ा था। उसके बाद बाजार बराबर बढ़ता ही रहा। 2016 के आखिरी चार महीनों में करीब 12% बढ़त साफ हो गई। फिर भी बाज़ार का जोश एकदम टूटा नहीं है। ऐसे में जानकार मानते हैं कि बाजार में नई खरीद से बढ़त का सिलसिला कम से कम अगले दो साल तक बदस्तूर चलता रहेगा। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

नए वित्त वर्ष 2017-18 का बजट आ गया। अगले कुछ दिन जानकार लोग इसके विश्लेषण में लगे रहेंगे। जीएसटी का अहम सुधार बाद में लागू किया जाना है। वैसे, खांटी ट्रेडरों के लिए खबरों का बहुत ज्यादा मायने-मतलब नहीं होता। वे तो वित्तीय बाजार के स्वभाव से खेलने हैं जो कभी सीधी रेखा में नहीं चलता। हमेशा ऊपर-नीचे होता रहता है। लहर की हर डुबकी उनके लिए कमाने का मौका होती है। अब पकड़ें गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अहम सालाना अनुष्ठान आज संपन्न होने जा रहा है। सबकी निगाहें कम से कम दोपहर दो बजे तक टीवी पर चिपकी रहेंगी कि वित्त मंत्री क्या-क्या घोषणा करने जा रहे हैं। बाज़ार की सांस उसी हिसाब से ऊपर-नीचे होती रहेगी। फिलहाल माहौल में उम्मीदों के बजाय निराशा का पुट ज्यादा दिख रहा है। ऐसे में ज़रा-सी खबर बड़ी हलचल का सबब बन सकती है। ट्रेडिंग में खतरा ज्यादा है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बाज़ार चाहता है कि अर्थव्यवस्था को विकास अच्छी रफ्तार से हो। लोगों के पास ज्यादा खर्च करने की क्षमता हो। इसलिए इनकम टैक्स में छूट की सीमा ढाई से बढ़ाकर कम से कम चार लाख कर दी जाए। लेकिन अगर कैपिटल गेन्स टैक्स से कोई नकारात्मक छेड़छाड़ की गई, सिक्यूरिटीज़ ट्रांजैक्शन टैक्स बढ़ाया गया तो बाजार नाराजगी भी जता सकता है। लेकिन मोदी सरकार के लिए साहसिक सुधार का यह आखिरी बजट है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

यह अर्थव्यवस्था को प्रभावित करनेवाली बड़ी नीतियों का हफ्ता है। कल से संसद का बजट सत्र शुरू हो रहा है। पहले दिन आर्थिक समीक्षा पेश की जाएगी। उसके अगले दिन, 1 फरवरी को वित्त मंत्री अरुण जेटली अपना तीसरा बजट पेश करेंगे। वे बजट में विदेशी निवेशकों को नाराज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकते। लेकिन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से चंद दिन पहले मतदाता को भी कतई हैरान-परेशान नहीं करेंगे। अब परखें सोम का व्योम…औरऔर भी

गणतंत्र दिवस बीत गया। राजधानी दिल्ली में समूचे भारत की सांस्कृतिक झांकियों से लेकर सामरिक शक्ति का प्रदर्शन भी हुआ। लेकिन हम एक बात भूल जाते हैं कि गणतंत्र में जितनी अहम भूमिका आमजन की है, उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका बाज़ार की है। सरकार या चंद व्यक्ति बाज़ार को अपनी उंगलियों पर नचाने लग जाएं तो आम नहीं, खासजन की मौज हो जाती है और गणतंत्र उसी पल दम तोड़ने लगता है। अब करें शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी