नदी या समुद्र में दो-चार लोटा पानी डाल देने से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन बांध का पानी छोड़ देने पर नदी में उफान आ जाता है। इसी तरह रिटेल निवेशकों की 200-400 शेयरों की खरीद से बाज़ार पर कोई फर्क नहीं पड़ता। उसे फर्क पड़ता है हर दिन करोड़ों का खेल करनेवाली देशी-विदेशी संस्थाओं और बैंकों व एचएनआई निवेशकों से। बाज़ार इनके लिए कोई शौक नहीं, बल्कि नियमित आय का धंधा है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

मानते हैं कि टिटहरी को गुमान है कि आकाश अगर गिरेगा तो वह उसे अपने पैरों पर संभाल लेगी। इसीलिए वो पैर ऊपर करके सोती है। हम-आप जैसे रिटेल ट्रेडरों को भी अगर गुमान है कि उनकी खरीद-बिक्री से वित्तीय बाज़ार की चाल पर खास फर्क पड़ता है तो उन्हें इसे फौरन दिमाग से निकाल देना चाहिए। हां, निश्चित रूप से हम भेड़चाल में फंसकर हमेशा गलत वक्त पर गलत फैसला करते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर या किसी भी वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग के दौरान हमारी स्थिति बराबर करो या मरो की रहती है। लालच और भय की भावनाएं हमें जकड़ लेती हैं। तनाव में हमारे शरीर की एड्रेनल ग्रंथि से कोर्टिज़ॉल नामक हॉर्मोन निकलता है जो एक स्तर से ज्यादा होने पर हृदय समेत सारी प्रतिरोधक क्षमता को तगड़ा नुकसान पहुंचाता है। यह हॉर्मोन सुबह 4 से 8 बजे तक न्यूनतम से अधिकतम पर पहुंच जाता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

ट्रेडरों के छोटे-बड़े सभी ग्रुपों में समस्या यह होती है कि उनसे जुड़नेवाले हर किसी का ब्रेनवॉश हो जाता है। सभी एक तरह से सोचने लगते हैं। इस तरह निवेश व ट्रेडिंग में भेड़चाल का शिकार हो जाते हैं। कहने का सार यह कि ट्रेडिंग ग्रुप से जुड़ना समस्या सुलझाता नहीं, बल्कि उलझा देता है। अपने पर भरोसा रखकर यह समझें कि आम व्यापारी कैसे खरीद-बेचकर कमाता है। इसे बनाएं अपनी मूल रणनीति। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

शेरों का झुंड मिलकर शिकार करता है। लेकिन ट्रेडरों में शायद ही कोई समूह ऐसा होगा जो बराबर फायदा कमाता है। समूह में कोई इधर खींचता है तो कोई उधर। खबरों व फंडामेंटल्स पर खेलनेवाला अपने को उस्ताद समझता है तो टेक्निकल एनालिसिस वाला खुद को किसी से कम नहीं समझता। फिबोनाकी संख्याएं व इलियट वेव्स भी उछाली जाती हैं। मगर, सभी बाज़ार से पीछे चलते हैं और बराबर मात खाते रहते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ट्रेडरों में दो खास ग्रुप चलते हैं। एक में ऐसे ट्रेडर हैं जिन्होंने अपना सिस्टम बना रखा है और बराबर मुनाफा कमाते हैं। वे सामाजिक दायरा बढ़ाने के लिए समूह बनाते हैं। दूसरा और कहीं ज्यादा बड़ा ग्रुप ऐसे ट्रेडरों का है जो हवा में तीर मारते हैं और कभी-कभार कमाते हैं। वे किसी ज्ञान/नुस्खे या टिप्स में चक्कर में समूह बना डालते हैं। दुर्भाग्य से उनकी कोशिश सरासर मृग-मरीचिका साबित होती है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

संघे-शक्तिः कलियुगे। आज जिसके पास संगठन और समूह है, वही जीतता है। अक्सर ट्रेडिंग में अकेले पड़ जाने के बाद हमें भी ऐसा लगता है। हम किसी न किसी ग्रुप से जुड़ने की फिराक में पड़ जाते हैं। कहीं नहीं तो फेसबुक जैसी सोशल वेबसाइट्स पर ही ग्रुप बना लेते हैं। लेकिन इससे ट्रेडिंग की सफलता में सचमुच हमें कुछ फायदा मिलता है या इसमें भी अच्छी-बुरी संगत से फर्क पड़ता है? अब परखें मंगलवार की बुद्धि…औरऔर भी

एकांगी सोच से जीवन में कभी सफलता नहीं मिलती। वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में भी अगर आप केवल अपनी सोचेंगे तो सफल नहीं होंगे। बराबर समझने की कोशिश करें कि अगर आप खरीदने पर आमादा हैं तो सामने कौन है जो बेचने को आतुर है। दोनों को क्यों ऐसा करने में फायदा दिखता है! ध्यान रखें कि बाजार में हमेशा अनजान लोगों का धन जानकारों के खाते की तरफ बहता है। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में वही ट्रेडर बराबर मुनाफा कमाते हैं जो किसी स्टॉक में मांग व सप्लाई के असंतुलन को सही ढंग से पकड़ पाते हैं। यह असंतुलन हमारे-आप जैसे रिटेल ट्रेडरों की खरीद-बिक्री से नहीं, बल्कि बैंक, वित्तीय संस्थाओं व हाई नेटवर्थ व्यक्तियों की चाल से बनता है। उस्ताद ट्रेडर इसके लिए टेक्निकल एनालिसिस से इतर तरीके अपनाते हैं। वे उस स्टॉक के फ्यूचर्स के बदलते ओपन इंटरेस्ट पर भी ध्यान देते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

अन्य बाज़ारों की तरह शेयर बाजार में भी मांग व सप्लाई का संतुलन बनता-बिगड़ता रहता है। आप कहेंगे कि हर कंपनी के जारी शेयरों की संख्या बंधी रहती है। प्रमोटर के हिस्से को हटाकर कंपनी का फ्लोटिंग स्टॉक भी बंधा रहता है। ऐसे में नई मांग आ सकती है। लेकिन नई सप्लाई कहां से आएगी। असल में बाज़ार में लगाकर भूल जानेवाले निवेशक काफी कम हैं। बाकी ज्यादातर निकालते व लगाते रहते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी