ब्रेकआउट का सीधा-सा मतलब है कि खरीदनेवाले ज्यादा हैं और बेचनेवाले बहुत कम। मांग सप्लाई से ज्यादा। ऐसे में नहीं पता रहता कि बाज़ार या कोई स्टॉक कहां तक ऊपर जाएगा। कोई लक्ष्य नहीं बांध नहीं सकते कि कहां तक पहुंचे तो निकल जाना चाहिए। इसलिए ऐसे ट्रेड में हमेशा ट्रेलिंग स्टॉप लॉस लगाकर चलना चाहिए। अचानक गिरने पर नहीं तो बड़ा घाटा लग सकता है। भाव जितना बढ़े, स्टॉप लॉस उठाते जाएं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

ब्रेकआउट ट्रेड तभी होता है जब शेयर का उच्चतम व न्यूनतम भाव पहले से ऊपर जा रहा हो या कम से कम न्यूनतम भाव बराबर उठ रहा हो। पिछले कुछ दिनों के भावों के ऊपरी-नीचे स्तर को मिलाकर रेखा खींचें तो उठता हुआ त्रिभुज बनता है। अमूमन ऐसी स्थिति में आरएसआई 45-50% के आसपास होता है। लेकिन ब्रेकआउट ट्रेड में बढ़ने-गिरने की प्रायिकता लगभग बराबर होती है तो ये काफी रिस्की होते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बाज़ार जब बराबर चढ़ रहा हो, अधिकांश शेयर नई ऊंचाइयां छू रहे हों, तब ब्रेकआउट ट्रेड करने का सलीका ही सबसे सही व कारगर रणनीति है। लेकिन ब्रेकआउट ट्रेड के कई तरीके हैं। इनमें से एक है फ्लैग-पैटर्न जिसे हमने कल इस्तेमाल किया। इसके अलावा टेक्निकल एनालिसिस में कुछ अन्य तरीके भी हैं जिन पर हम अगले दिनों  चर्चा करेंगे। मगर, इनमें समान पहलू यह है कि ऐसे ट्रेड बड़े रिस्की होते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार के तमाम सूचकांक ऐतिहासिक ऊंचाई पर। हर पांच लिस्टेड कंपनी में से चार के शेयर 52 हफ्तों के उच्चतम स्तर पर। 20% गिरे हुए शेयरों को हाथ लगाने में भी डर लगता है कि कहीं और न गिर जाएं। अखबार, चैनल व विश्लेषक सभी ‘बुल-रन’ का हल्ला मचाने लगे हैं। रिटेल निवेशक भी अपनी पूंजी लेकर बाज़ार की तरफ दौड़ पड़ा है। लालच के इस दौर में क्या हो ट्रेडिंग रणनीति? अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

कभी आपने गौर किया है कि मनीकंट्रोल जैसी वेबसाइटों या बिजनेस चैनलों पर आनेवाले एनालिस्ट ज्यादातर ऐसे शेयर खरीदने को कहते हैं जो पहले ही काफी चढ़ चुके होते हैं। ऊपर से उनमें बढ़ने की जितनी संभावना होती है, उतना ही गहरा स्टॉप-लॉस लगाने को कहते हैं। मसलन, रैम्को सीमेंट्स को 720 पर 790 के लक्ष्य के साथ खरीदो, जबकि स्टॉप-लॉस 650 का है। यानी, 9.72% बढ़त तो उतना ही फटका! इनसे बचें। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

अब तक जो चुका है, उसका इशारा कुछ और होता है, जबकि हो जाता है कुछ और। फिर भी हम भविष्य की योजना बनाना नहीं छोड़ सकते क्योंकि पूरी तरह भाग्य भरोसे रहना इंसान की मूल फितरत नहीं है। जहां जानवर हमेशा परिस्थितियों के माफिक खुद को ढालते हैं और इंसान भी कुछ हद तक ऐसा करता है, वहीं इंसान हालात को बदलता भी है। यही मानव सभ्यता की विकासगाथा का मूल है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

दो दिन के व्यवधान के बाद यह कॉलम दोबारा हाज़िर है। असल में यही अनिश्चितता है जिस पर आपका कोई वश नहीं चलता। यहां आकर आपकी सारी योजना धरी की धरी रह जाती है। वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग करते वक्त हमें अनिश्चितता का यह पहलू हमेशा ध्यान में रखना चाहिए। यह सकारात्मक भी होती है और नकारात्मक भी। फायदा तो अच्छा और घाटा तो हमें उसके सामने हाथ खड़ा करके निकल जाना चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

हमें बाज़ार की तथाकथित ‘गोपनीय’ या ‘गुप्त’ जानकारियों के चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहिए। आखिर जिसके पास पूरी नदी हो, उसे कुंओं या बावड़ी में झांकने की क्या ज़रूरत! एक तो ये जानकारियां भरोसा करने लायक नहीं होतीं। दूसरे, इन्हें पूरा निचोड़ लेने के बाद बाहर फेंका जाता है। तीसरे, शेयरों के भाव व उसके पैटर्न में काम की सारी जानकारियां समाहित रहती हैं। उसके बाद का कमाल हमारी बुद्धि करती है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बैंक व देशी-विदेशी वित्तीय संस्थान पुख्ता इंतज़ाम रखते हैं कि उनकी ट्रेजरी डेस्क को कंपनियों की जो खास अंदरूनी जानकारियां हासिल हैं, वे किसी भी तरह लीक न हों। उनके इस विभाग के किसी भी नए-पुराने कर्मचारी को शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग की इजाज़त नहीं होती। मसलन, मेरे एक दोस्त की बेटी आईआईएम से एमबीए करने के बाद जेपी मॉर्गन में कार्यरत है, लेकिन वो ट्रेड या निवेश नहीं कर सकती। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

अंदर की, अघोषित सूचनाओं के आधार पर शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग या निवेश करना अपराध है। इसे इनसाइडर ट्रेडिंग कहते हैं। यह अलग बात है कि यह अपराध तय होने में दसियों साल लग जाते हैं। उसके ऊपर भी अपील पर अपील चलती रहती है। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ का ताज़ा मामला साल 2007 का है। इसमें बड़े मलाई खाते हैं, जबकि छोटे व रिटेल ट्रेडरों को ‘इनसाइडर’ खबरों के नाम पर फंसाया जाता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी