अपनी भावनाओं का सारथी बनना और दूसरों की भावनाओं का शिकार करना। यही वह असली सॉफ्टवेयर है जिससे आप शेयर बाज़ार ही नहीं, हरेक वित्तीय बाज़ार में बड़े सुकून से बराबर कमाई कर सकते हैं। जिस दिन आप शेयरों के भाव के पीछे घहराती भावनाओं के बादल को समझने लग जाते हैं, उसी दिन से आपको इस खेल में आनंद आने लगता है और यही आनंद फिर आपको कमाई तक ले जाता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

भीड़ से अलग चलने के लिए बड़ा जिगरा चाहिए। यह एक ऐसी शर्त है जिसे पूरा किए बिना आप वित्तीय बाज़ार से बराबर मुनाफा नहीं कमा सकते। इस शर्त का मूलाधार है खुद अपने भीतर की भावनात्मक बाधाओं पर जीत हासिल करना। इसमें ध्यान काफी मददगार साबित हो सकता है। ऐसे ध्यान से आप अपनी भावनाओं के प्रेक्षक बनने का अभ्यास करते हैं। फिर एक दिन आप भावनाओं के सारथी बन जाते हो। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

अगर हम अपने नैसर्गिक/प्राकृतिक स्वभाव से शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग या निवेश करने लग जाएं तो भयंकर मुसीबत में फंस सकते हैं। बराबर मुनाफा कमानेवाला ट्रेडर तब खरीदता है, जब हर कोई बेच चुका होता है। वहीं, वह तब बेचता है जब हर कोई खरीद चुका होता है, शेयर के भाव काफी चढ़ चुके हैं और चार्ट पर हरे-हरे कैंडल ही दिख रहे होते हैं। वह भीड़ की मानसिकता से अलग चलता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

गीता में मन को मनुष्यों के बंधन और मुक्ति का कारण बताया गया है। बुद्ध भी मानते थे कि मानव-मन में जो सहज भावनाएं उठती हैं, वे अक्सर छलिया होती हैं। इसलिए मन व भावनाओं को साधना जीवन में सफलता के लिए आवश्यक है। ट्रेडिंग भी इसका अपवाद नहीं। हमारे अवचेतन में भरा है कि सब डरें तो डरो और चहकें तो चहको। लेकिन यह सोच निवेश व ट्रेडिंग के लिए आत्मघाती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

कौन नहीं जानता कि सामान्य व्यापार से लेकर वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाने का मुख्य आधार है थोक भाव पर खरीदना और रिटेल भाव पर बेचना। ट्रेडिंग के तर्क, नियम और रणनीति को सीखना-समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। लेकिन असली चुनौती तब शुरू होती है जब हम उन्हें व्यवहार में अपनाना शुरू करते हैं। तब सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ा हो जाता है हमारा मन, उसमें उठ रहे भाव व भावनाएं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

वित्तीय साक्षरता का मूलाधार है धन का समय-मूल्य। जब तक समाज में महंगाई का वजूद है, जिससे मुद्रास्फीति और ब्याज़ दरों का सीधा रिश्ता है, तब तक हमें गांठ बांध लेनी होगी कि साल भर बाद का सौ रुपए आज के सौ रुपए से कमतर होगा। पांच साल में अगर हमारी आय 10,000 से 20,000 हो गई और मुद्रास्फीति सालाना 10% रही है तो हमारी आय हकीकत में मात्र 4105 रुपए बढ़ी है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

अगर हम वित्तीय रूप से साक्षर नहीं हुए तो वित्तीय सलाहकार या ब्रोकर ही नहीं, सरकार तक हमें उल्लू बनाती रहेगी। आखिर वो भी तो हमारे प्रत्यक्ष व परोक्ष टैक्स से चलती है। अभी तो अवाम या देश का भला हो या न हो, मगर नेताजी का भरपूर भला हो जाता है। वे पांच साल में इतना बना लेते हैं कि सात पुश्तें किसी राजा-रजवाड़े की तरह बैठकर खा सकती हैं। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

वित्तीय साक्षरता या शिक्षा का मकसद है कि हमें कोई उल्लू न बना सके, चाहे वो सरकार हो या वित्तीय सलाहकार। दिक्कत यह है कि शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग करनेवाले लोग तक खुद को वित्तीय मामलों में कायदे से शिक्षित नहीं करते। नतीजा यह होता है कि ब्रोकर उनके साथ बड़े आराम से छल करता है। बीमा एजेंट पॉलिसी बेचकर अपने कमीशन का इंतज़ाम कर लेता है, मगर उन्हें सब्जबाज़ दिखाकर। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

जिनके पास सीमित बचत है, जो बस इतना कमाते हैं कि घर-परिवार चला लेने और आकस्मिकता से निपटने का इंतज़ाम कर लेने के बाद सालाना 40-50 हज़ार बचा पाते हैं, उनके लिए वित्तीय सलाहकार रखना संभव नहीं। उन्हें तो खुद ही वित्तीय रूप से साक्षर के साथ-साथ शिक्षित भी बनना पड़ता है। उन्हें बीमा का चक्कर भी समझना पड़ता है और शेयर बाज़ार से लेकर म्यूचुअल फंडों तक की जानकारी रखनी पड़ती है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

जो लोग अपने लिए सर्वोत्तम वित्तीय फैसले करना भलीभांति जानते हैं, वे मनचाही ज़िंदगी जी लेते हैं। वहीं, जो लोग वाजिब वित्तीय फैसले लेना नहीं जानते, उनके सामने सीमित विकल्प होते हैं। वे दरअसल दूसरों द्वारा तय की गई ज़िंदगी जीते हैं। जिनके पास पर्याप्त धन है, वे तो वित्तीय सलाहकार की सेवाएं ले सकते हैं। लेकिन अगर वे भी वित्तीय रूप से शिक्षित नहीं हैं तो सलाहकार उनकी जेब काट सकता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी