दिक्कत यह है कि अपने यहां आर्थिक आंकडों का घनघोर अकाल है। मुद्रास्फीति या औद्योगिक उत्पादन को छोड़ दें तो हम बहुत सारे आंकड़ों मे बहुत-बहुत पीछे चलते हैं। इसलिए बहुत सारे काम में अंदाज़ चलता है। ऐसा ही एक अंदाज़ है कि शेयर बाज़ार के लगभग 95% ट्रेडर घाटा उठाते हैं, जबकि बमुश्किल 5% ही कमा पाते हैं और इन 95% ट्रेडरों में से तकरीबन सारे के सारे रिटेल ट्रेडर होते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

आयकर विभाग के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2014-15 या आकलन वर्ष 2015-16 में शेयर बाज़ार से हुई आय पर शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स देने या घाटा क्लेम करनेवाले ट्रेडरों की संख्या 38.19% बढ़ गई। हम इसके आधार पर आसानी से अनुमान लगा सकते हैं कि बाद के ढाई सालों में हमारा शेयर बाज़ार जिस तरह से बढ़ा है, उसमें सक्रिय ट्रेडरों की संख्या बराबर ऐसी ही तेज़ी से बढ़ रही होगी। अब गुरुवार की दशा-दिशा…और भीऔर भी

तीन करोड़ डीमैट खातों में से 50 लाख ट्रेडर। इस तरह देश में फिलहाल कुल डीमैट खाताधारकों में से करीब 16% ट्रेडर हैं। इनमें से करीब 15% ही शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स दे या घाटा क्लेम कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में 2.41% निवेशक ही ट्रेडिंग से दिखा सकने लायक आय कमा रहे हैं। हालांकि शेयर बाज़ार से हुई आय पर शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स देनेवालों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडर उन्हें माना जाएगा जो साल भर के भीतर शेयर बेच देते हैं। आयकर विभाग के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2014-15 के दौरान देश में सक्रिय ट्रेडरों की संख्या करीब 50 लाख थी। इनमें से 7.34 लाख ट्रेडरों ने शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स भरा या घाटा क्लेम किया था। शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स की दर 15% है, जबकि साल भर बाद बेचने पर कोई कैपिटल गेन्स टैक्स नहीं लगता। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

हमारे यहां शेयर बाज़ार में कितने लोग सक्रिय ट्रेडिंग करते हैं? दोनों डिपॉजिटरी कंपनियों के सम्मिलित आंकड़ों के मुताबिक देश में कुल डीमैट खातों की अद्यतन संख्या 3.04 करोड़ है। माना जा सकता है कि शेयर बाज़ार के निवेशकों की संख्या इसी के आसपास होगी। वैसे, बीएसई के मुताबिक निवेशकों की मौजूदा संख्या 3.72 करोड़ है। अंदाज़ लगाइए कि इनमें से कितने लोग महीने में कम से कम एक बार ट्रेडिंग करते होंगे? अब सोम का व्योम…औरऔर भी

अर्थशास्त्र के महाज्ञानी, नोबेल पुरस्कार विजेता तक कह चुके हैं कि छोटी अवधि में शेयरों के भावों की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। दूसरे शब्दों में शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग मूलतः अटकलबाज़ी या कयासबाज़ी पर ही आधारित है। हालांकि बाज़ार के मनोविज्ञान और भावों के पिछले पैटर्न से नई खरीद या बिक्री का अनुमान लगाया जाता है। लेकिन वह भी होता तो अनुमान ही है। इसलिए यहां स्टॉप लॉस न लगाना आत्मघाती है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

एलआईसी जैसी संस्थाओं और प्रोफेशनल ट्रेडरों की राह ही सही है। वे किसी सामान्य व्यापार की तरह शेयर बाज़ार में थोक के भाव पर खरीदते और रिटेल के भाव पर बेचते हैं। लेकिन ज्यादातर रिटेल ट्रेडरों को लगता है कि शेयर बाज़ार अन्य बाज़ारों से बहुत भिन्न है और वे अपना कोई सिस्टम विकसित किए बिना टिप्स के चक्कर में मारे-मारे फिरते हैं। सौदा गलत पड़े तो उनका अहंकार और ज्यादा फुफकारता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

एलआईसी ने चालू वित्त वर्ष 2017-18 में अप्रैल से सितंबर तक के छह महीनों में शेयर बाज़ार से 12,374 करोड़ रुपए का मुनाफा कमा लिया जो साल भर पहले की समान अवधि के मुनाफे 10,643 करोड़ रुपए से 16.26% ज्यादा था। अमूमन औसत प्रोफेशनल ट्रेडर साल में बाज़ार से 10 लाख रुपए कमाते हैं। यानी, एलआईसी ने छह महीने में ही करीब सवा लाख प्रोफेशनल ट्रेडरों जितना कमा लिया। कौन किस पर भारी! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

साल 2017 का आखिरी हफ्ता। यह शेयर बाज़ार के लिए शानदार साल रहा। 23 दिसंबर 2016 से 22 दिसंबर 2017 के बीच सेंसेक्स 30.34% और निफ्टी 31.40% बढ़ा है। हर ट्रेडर को समीक्षा करने की ज़रूरत है कि बाज़ार ने जब इतना दिया तो उसने कितना कमाया? अगर बाज़ार से ज्यादा नहीं कमाया तो कहां चूक रह गई? मनन करें कि आखिर अपनी ट्रेडिंग के तरीके में आगे क्या सुधार कर सकते हैं? अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

गुजरात चुनावों में भाजपा के कमज़ोर बहुमत का असर यह होगा कि मोदी सरकार बाकी बचे करीब सवा साल के कार्यकाल में कठोर आर्थिक फैसले लेने से बचेगी और लोगों को लुभानेवाले फैसलों को तवज्जो देगी। हो सकता है कि शेयर बाज़ार इन फैसलों को बहुत उत्साह से न ले। दूसरे, सितंबर 2013 से चल रही तेज़ी के बाद बाज़ार में अभी नहीं तो कुछ महीने बाद मुनाफावसूली का दौर चल सकता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी