वॉल स्ट्रीट जनरल के पहले संपादक और डाउ जोन्स एंड कंपनी के संस्थापक थे चार्ल्स एच. डाउ। करीब सौ साल पहले उनके लिखे अनेक संपादकीय के आधार पर डाउ सिद्धांत निकाला गया। इसके मुताबिक शेयर बाज़ार में तीन प्रमुख दौर चलते हैं। एकट्ठा करने का दौर, व्यापक लोगों की भागादारी का दौर और बेचकर मुनाफा कमाने या वितरण का दौर। आमतौर पर रिटेल निवेशक पहले दौर के बजाय तीसरे दौर में आते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

यूं तो शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में वोल्यूम का बहुत ज्यादा महत्व नहीं होता। वैसे भी इसके आंकड़े इतना गड्डम-गड्ड होते हैं कि इससे कोई साफ तस्वीर नहीं उभरती। इसलिए इसके चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। लेकिन इसका भान ज़रूर होना चाहिए कि बाज़ार में इतने करोड़ों का कारोबार कौन लोग खड़ा करते हैं। आम निवेशकों या ट्रेडरों की स्थिति सागर तो नहीं, लेकिन तालाब में एक मग पानी से ज्यादा नहीं होती। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बीएसई व एनएसई के कैश सेगमेंट में हर दिन औसतन 32,000 करोड़ रुपए का कारोबार। डेरिवेटिव सेगमेंट में यह आंकड़ा 4 लाख करोड़ रुपए तक चला जाता है। शेयर बाज़ार में पंजीकृत निवेशकों की संख्या 3.88 करोड़ हो चुकी है। लेकिन बराबर सक्रिय निवेशकों या ट्रेडरों की संख्या दो लाख से ज्यादा नहीं होगी। देशी व विदेशी संस्थाएं 10-12 हज़ार करोड़ रुपए से ज्यादा का धंधा नहीं करतीं। कौन हैं बाकी खिलाड़ी! अब सोम का व्योम…और भीऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाना है तो हमें समग्र अर्थशास्त्र के बजाय इंसान के धन-संबंधी मनोविज्ञान को कायदे से समझना पड़ेगा। तभी हम अपने पूर्वाग्रहों के निजात पा सकते हैं। इनमें सबसे अहम पूर्वाग्रह है कि हम फायदे पर जितना चहकते हैं, उतनी ही रकम के नुकसान पर दोगुना दुखी हो जाते हैं। इस सोच के चलते घाटा लगने पर भी किसी सौदे को छोड़ नहीं पाते और घाटा बढ़ाते जाते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

दुनिया हमारे मन से नहीं, अपने नियम-धर्म से चलती है। धन से जुड़े वित्तीय बाज़ार का हाल तो एकदम निराला है। व्यक्तियों का मनोविज्ञान जब एक साथ मिलकर समूह का मनोविज्ञान बनता है तो उसका रूप-रंग एकदम बदल जाता है। लेकिन हम मन में जमे अपने पूर्वाग्रहों से इस कदर चिपके रहते हैं कि सामूहिक मनोवैज्ञानिक को समझ नहीं पाते। ट्रेडिंग से कमाने में हमारा यह सहज ‘संस्कार’ बड़ा घातक साबित होता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में बहुत सारा ज्ञान काम नहीं आता। मशहूर किस्सा है कि साल 1720 में न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिक ने पहले तो साउथ-सी कंपनी के शेयर बेचकर 7000 डॉलर कमाए। लेकिन उसके कुछ महीने बाद ही चढ़े बाज़ार में 20,000 डॉलर गवां डाले। सोचिए, जिसने तीन अकाट्य नियम दिए, जो ग्रहों की गति की सटीक गणना कर लेता था, वही वैज्ञानिक बाज़ार के मन की सटीक गणना नहीं कर पाया। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

जीवन में हम इसलिए नहीं मात खाते कि हम कम जानकार या बुद्धिमान हैं, बल्कि ज्यादातर मात हम इसलिए खाते हैं क्योंकि जो जैसा है, उसे वैसा उसी रूप में, यथाभूत नहीं देख पाते। हम मन पहले बनाते हैं। फिर दूसरों की बात-सलाह और आंकड़ों से उसकी पुष्टि करते हैं। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में हम मन के आईने से सच देखते हैं, जबकि असली सच दूर खड़ा हमें चिढ़ाता रहता है। अब सोमवार का व्योम…और भीऔर भी

क्या डेरिवेटिव सौदों में हाथ डालना आम निवेशकों के लिए वाजिब है? असल में निफ्टी ऑप्शंस अपने-आप में बहुत लुभावना ट्रैप है। निफ्टी के कॉल या पुट सौदों में ज्यादा धन लगता नहीं और जनरल इंश्योरेंस की तरह जितना लगता है, ज्यादा से ज्यादा उतना ही डूबता है तो लोग छपाक से कूद पड़ते हैं। लेकिन इस सेगमेंट में 3/4 से ज्यादा सटोरिया ऑपरेटर सक्रिय हैं। एफआईआई या डीआईआई 1/4 तक सिमटे हैं। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

वित्तीय संस्थाएं और बैंक तो साल भर ट्रेड करते हैं। लेकिन बहुत सारे प्रोफेशनल ट्रेडर कुछ ही महीने ट्रेड करते हैं। मसलन, कुछ ट्रेडर केवल तिमाही नतीजों के दौरान ही सक्रिय होते हैं। वे नतीजों से जोड़कर कंपनी के शेयर की चाल पर गौर करते हैं और उसके अनुरूप धैर्य से खरीदने या बेचने का फैसला करते हैं। वे अपना रिस्क अच्छी तरह जानते-समझते हैं। लेकिन अनावश्यक सटोरियापन से बचते हैं। अब पकड़ते हैं मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

संस्थाओं और प्रोफेशनल निवेशकों का अपना-अपना अलग अंदाज़ है। लेकिन वे किसी तनाव में आए बगैर बड़ी शांति से काम करते हैं। कुछ हैं जो केवल निफ्टी-50 सूचकांक के स्टॉक्स में ही ट्रेड करते हैं। इसमें भी कुछ तो केवल चुनिंदा 20 स्टॉक्स को ही हाथ लगाते हैं। वहीं, कुछ चार-पांच स्टॉक्स तक सीमित हैं। बाकी बाज़ार कहां जा रहा है, इसको जानते ज़रूर हैं, लेकिन उस पर फालतू की मगज़मारी नहीं करते। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी