छोटे घाटे और बड़े मुनाफे की रणनीति में हम वही सौदे चुनते हैं जिनमें रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात कम से कम 1:3 का होता है। यानी, 2% रिस्क तो 6% बढ़ने की गुंजाइश। रिवॉर्ड की झलक शेयर के भावों का चार्ट दिखा देता है। वह रिस्क भी दिखाता है। लेकिन रिस्क बड़ी व्यक्तिगत चीज़ है। हर किसी की रिस्क उठाने की क्षमता अलग-अलग होती है। शुरुआती ट्रेडर को अधिकतम 2% रिस्क लेकर ही चलना चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

डर व लालच की भावनाओं के वशीभूत होने के कारण आम ट्रेडर सही दांववाले सौदों में फटाफट मुनाफा पकड़कर निकल जाता है, जबकि उल्टे पड़े सौदों से चिपका रहता है। वो घाटा नहीं उठाना चाहता। उसे आशा रहती है कि बाज़ार ज़रूर पलटेगा और उसके सौदे फायदे में आ जाएंगे। यह सहज व सकारात्मक सोच ट्रेडिंग में सफलता के लिए गलत है। सही तरीका है छोटे घाटे और बड़े मुनाफे की रणनीति अपनाना। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेड/निवेश करने बहुतेरे आते हैं। मगर घाटा खाने के बाद किनारे लग जाते हैं। उनका कोई स्थाई मकसद नहीं होता। लेकिन जो लोग किसी भी वजह से सोच-विचारकर ट्रेडिंग को गंभीरता से चुनते हैं, उनके दो पक्के मकसद होते हैं; बराबर धन कमाना और कमाई कभी न गंवाना। बस, इसी के साथ वे डर व लालच की दो विकट भावनाओं में लिपट जाते हैं और बाज़ार उनसे खेलने लगता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

जिस तरह सिर्फ चिनगारी या लपटों को देखकर आप आग का स्रोत नहीं पकड़ सकते। उसी तरह सिर्फ भावों को देखकर स्टॉक की चाल नहीं पकड़ी जा सकती। यकीनन, सबसे ज़रूरी है कि भावना के बजाय तर्क से काम लेना। लेकिन तर्क सभी संबंधित तथ्यों को जुटाए बिना बुद्धि-विलास बन जाता है और किसी काम का नहीं रहता। भाव बराबर तब बढ़ता है जब संस्थाएं खरीदने को आतुर होती हैं, अन्यथा गिरते हैं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

दुनिया के ग्लोबल होते जाने से तमाम शेयर बाजारों की भौगोलिक सीमाएं काफी हद तक मिट गई हैं। न्यूयॉर्क से टोक्यो और लंदन से दिल्ली तक अक्सर एक-सी लहर चलती है। फिर भी हर शेयर बाज़ार का अपना विशिष्ट स्वभाव होता है। इसमें भी हर स्टॉक का अपना अलग स्वभाव होता है। स्वभाव की यह भिन्नता उस शेयर बाज़ार या स्टॉक से चिपके अलग तरह के ट्रेडरों व निवेशकों से तय होती है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

बारिश का मौसम। पहले तेल के दीए, अब बिजली के बल्ब जलते हैं। लेकिन पतंगों में ऐसा रसायन होता है कि उन्हें कुछ और ही नज़र आता हैं। वे रौशनी पर टूट पड़ते हैं। दीए/बल्ब को कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन सुबह तक नीचे मृत पतंगों का ढेर लग जाता है। शेयर बाज़ार में रिटेल ट्रेडरों का यही हश्र होता है। बचना है तो उन्हें अपना नौसिखियापन छोड़कर प्रोफेशनलों जैसा हुनर सीखना होगा। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

किताबों या ऑनलाइन वीडियो से ट्रेडिंग सीखने तक तो गनीमत है। लाखों लोगों को लगता है कि वे बिजनेस चैनल देखकर ट्रेडिंग/निवेश में पारंगत हो जाएंगे। लाखों व सालों गंवाने के बाद उन्हें समझ में आता है कि वे मरीचिका में जी रहे थे। ट्रेडिंग में जीत का तुक्का किसी का भी लग सकता है। पर, बराबर जीतना है तो ट्रेडिंग के तर्क-सम्मत नियमों को निरतंर अभ्यास से अपना संस्कार बनाना पड़ता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बहुत आसान है यह कहना कि बाज़ार में प्रोफेशनल ट्रेडर सही वक्त पर एंट्री करते और सही वक्त पर निकलते हैं, जबकि नौसिखिया/रिटेल ट्रेडर गलत वक्त पर एंट्री और गलत वक्त पर बाहर निकलते हैं। अहम सवाल यह है कि इस गलत को सही करने का रास्ता क्या है? बहुत-से लोगों को लगता है कि कुछ किताबें पढ़ ली जाएं, ट्रेडिंग पर कुछ ऑन-लाइन वीडियो देख लिए जाएं तो सही रास्ता मिल जाएगा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

मन को नकारात्मक व नुकसानदेह मान्यताओं या धारणाओं के मुक्त करने के एक नहीं, अनेक तरीके हैं। मूल बात है कि इन्हें हमें अपने अंदर देखना होगा। इन्हें देखना भर है। न इनसे जुड़ाव रखना है, न दुराव। इतना करते ही इनका मिटना शुरू हो जाएगा। एक दिन चेतन और अवचेतन मन के बीच की लौह दीवार टूट जाएगी और मन पूरी ताकत से खिल उठेगा। लेकिन यह काम आपको खुद करना होगा। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

धीरे-धीरे पुरानी मान्यताएं पीछे हटती जाती हैं और उनकी जगह ट्रेडिंग का वस्तुपरक नज़रिया लेने लगता है। हमें कभी-कभी आंखें बंदकर इस नए नज़रिए को आकार लेते महसूस करना चाहिए। पुराने के जाने और नए के आने को अनुभूति पर कसना चाहिए। इस तरह हम अपने अवचेतन मन को ट्रेन करते जाते हैं। याद रखें कि अवचेतन मन हमारी 95% क्रियाओं व सोच को कंट्रोल करता है, जबकि चेतन मन मात्र 5% को। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी