सरकार अगर वाकई कुछ करना चाहती तो वह केंद्र और राज्य सरकारों में इस समय खाली 24 लाख से ज्यादा पदों को फौरन भरने का इंतज़ाम कर देती। लेकिन उसने एनएसएसओ की वह रिपोर्ट ही दबा दी जिसमें खुलासा हुआ कि 2017-18 में देश में बेरोजगारी की दर 45 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। दिक्कत यह है कि मोदी सरकार को ठोस काम के बजाय नए-नए जुमलों पर ज्यादा यकीन है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

पीयूष गोयल कहते हैं कि बजट में संख्याओं से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है क्योंकि प्रधानमंत्री ईमानदार बजट चाहते थे। लेकिन जानकार बताते हैं कि इसमें इतनी बेईमानी बरती गई है कि यह बजट नहीं, फजट बन गया है। आईडीबीआई के लिए एलआईसी से वसूले गए 65,000 करोड़ को छोड़ दें, केवल एफसीआई की 1.40 लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी को जोड़ दे तो राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4% हो जाता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

बजट में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए पेंशन का सब्जबाग फेंका गया है। लेकिन यह पेंशन इस समय बूढ़े हो रहे मजदूरों को नहीं, बल्कि अभी 29 साल के उस मजदूर को 60 साल का होने पर मिलेगी, जो प्रतिमाह 100 रुपए अपने पेंशन खाते में डालेगा। 8% सालाना ब्याज पर मजदूर की यह बचत 30 साल में 1.50 लाख रुपए हो जाएगी। इस पर सरकार उसे 3000 रुपए प्रतिमाह पेंशन देगी। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अगर बातों से चुनावी जंग और कस्मे-वादों से दिल जीता जा सकता तो इसमें मोदी सरकार का कोई तोड़ नहीं है। सरकारी नौकरियों और शिक्षा में सवर्ण गरीबों के लिए 10% आरक्षण घोषित कर दिया। लेकिन इसे लागू करने का कोई इंतज़ाम नहीं किया। बजट में 12 करोड़ छोटी जोतवाले किसानों को सालाना 6000 रुपए देने की घोषणा कर दी। लेकिन इन किसानों की पहचान कैसे की जाएगी, यह तक स्पष्ट नहीं है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

चुनावी साल में पेश किए गए बजट का कोई मतलब नहीं होता। फिर भी एनडीए सरकार ने बजट में किसानों के खातों में 75,000 करोड़ रुपए डालने, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए पेंशन स्कीम और नौकरीपेशा तबके के लिए इनकम टैक्स की सीमा बढ़ाकर 5 लाख रुपए करने का ऐलान कर दिया। इन पर अमल मई में बननेवाली सरकार पर निर्भर है। लेकिन शेयर बाज़ार के नजरिए से यह अच्छा बजट है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अरुण जेटली इलाज कराने अमेरिका गए हैं तो उनकी जगह पीयूष गोयल आज बजट पेश कर रहे हैं। संविधान की व्यवस्था के मुताबिक, मई में लोकसभा चुनाव होने हैं तो यह मूलतः अंतरिम बजट है और इसे ‘वोट ऑन एकाउंट’ या लेखानुदान ही होना चाहिए ताकि नई सरकार बनने तक केंद्र में वर्तमान सरकार का कामकाज चलता रहे। लेकिन मोदी सरकार चुनावी चासनी फेंकने के लिए पूरा बजट पेश करने पर उतारू है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बजट में न तो उद्योग के लिए कुछ होगा और न ही उसमें टैक्स संबंधी कुछ प्रस्ताव लाए जा सकते हैं। कारण यह कि अब कस्टम ड्यूटी के अलावा सारे परोक्ष टैक्स जीएसटी में समाहित हो गए हैं जिसकी दरों का फैसला जीएसटी परिषद करती है। वहीं, प्रत्यक्ष टैक्स में कॉरपोरेट टैक्स पहले ही घटाकर 25% किया जा चुका है, जबकि व्यक्तिगत इनकम टैक्स पर सरकार कुछ करने की स्थिति में नहीं है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

अर्थशास्त्रियों से लेकर देशी-विदेशी रेटिंग एजेंसियों तक के लिए इस बार सबसे अहम होगा यह देखना कि मोदी सरकार ने राजकोषीय घाटे का लक्ष्य कार्यकाल के अंतिम वर्ष 2018-19 में पूरा किया है या नहीं। राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी के 3.3% तक बांधने का था। लेकिन जानकारों के मुताबिक यह किसी भी सूरत में 3.7% से कम नहीं हो सकता। सरकार तय उधारी का 115% तो नवंबर तक ही उड़ा चुकी थी। अब बुध की बुद्धि…और भीऔर भी

इस बार के बजट में जो भी घोषणाएं होंगी, वे महद सदिच्छाएं हैं और उनका कोई व्यावहारिक मतलब नहीं है। अगर लोकसभा चुनावों में बहुमत हासिल करने के बाद दोबारा एनडीए सरकार बनती है, तब भी उसे अलग से पूर्ण बजट पेश करना पड़ेगा। वहीं, अगर एनडीए को बहुमत न मिला और कोई दूसरी सरकार बनी, तब तो यह अंतरिम बजट लेखानुदान ही बनकर रह जाएगा और इसकी सारी घोषणाएं बेकार चली जाएंगी। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

16वीं लोकसभा का अंतिम बजट सत्र गुरुवार, 31 जनवरी से शुरू हो रहा है। उस दिन आर्थिक समीक्षा पेश की जानी थी। अफसोस! इस बार ऐसी कोई समीक्षा पेश नहीं होगी। बजट सत्र 13 फरवरी तक चलेगा। लेकिन पूरा देश धीरे-धीरे चुनावमय होता जा रहा है तो बजट की परवाह सरकार के अलावा किसी को नहीं है। हालांकि बाज़ार के लिए यह पूरा हफ्ता बजटमय रहेगा और वह भविष्य के संकेत खोजना चाहेगा। अब सोम का व्योम…औरऔर भी