इंसान किसी काम में माहिर नहीं हो जाता, तब तक उसे बाहरी मदद की दरकार रहती है। यह बड़ी स्वाभाविक इच्छा है। शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग की शुरुआत में भी टिप्स पाने की इच्छा जगती है। लेकिन धीर-धीरे जब आप बाज़ार के स्वभाव को समझकर अपना सिस्टम विकसित कर लेते हो, तब बाहरी टिप्स या सलाह का कोई मतलब नहीं रह जाता। तब उसका महत्व बच्चे से उंगली पकड़वाने जितना रह जाता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

सभी जानते हैं कि भारतीय बैंकों का एनपीए फिलहाल 10 लाख करोड़ रुपए से ऊपर चल रहा है। लेकिन कम लोग जानते हैं कि शेयर बाज़ार में लिस्टेड 2947 कंपनियों के प्रवर्तकों ने अपने लगभग 2.26 लाख करोड़ रुपए के शेयर अभी गिरवी रखे हैं। इन प्रवर्तकों ने कंपनी व धंधे के लिए ही शेयर गिरवी रखकर लोन लिया होगा। अगर लोन देनेवाले इनके शेयर बेचने लगे तो पूरा बाज़ार धराशाई हो जाएगा। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

तथ्य अलग, बाज़ार का सत्य अलग। एक तो अपने यहां पहले से ही बेरोज़गारी जैसे अहम आर्थिक कारकों के ताज़ा आंकड़े उपलब्ध नहीं है। दूसरे, 2015 में जीडीपी की नई सीरीज़ आने के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था के सरकारी आंकड़े बड़े अविश्वसनीय हो गए हैं। कॉरपोरेट क्षेत्र अगर वाकई इतना बढ़ रहा होता तो बीएसई में लिस्टेड 4684 में से 2947 यानी 62.9% कंपनियों के प्रवर्तकों ने अपने शेयर गिरवी नहीं रखे होते। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग के लिए जो भी अलगोरिदम या कंप्यूटर सॉफ्टवेयर/प्रोग्राम बने हैं, वे पिछले भावों के पैटर्न पर आधारित होते हैं। लेकिन बाज़ार का अकाट्य सत्य यह है कि यहां भविष्य के भाव बड़े मनचले होते हैं और कतई ज़रूरी नहीं कि वे पिछले पैटर्न का पालन करें। भाव किस वजह से किधर चले जाएंगे, इसका कोई भरोसा नहीं। बाज़ार व भावों का रुख धन का प्रवाह अचानक बदल देता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में सारी कमाई भावों के उतार-चढ़ाव पर होती है। यह उतार-चढ़ाव धन के प्रवाह और सहज मनोविज्ञान पर निर्भर करता है। ट्रेडिंग के पीछे अभी तक कोई साइंस न खोजा गया है और न ही शायद भविष्य में खोजा जा सके क्योंकि इसमें न जाने कितने देशों के लाखों धनवानों के लालच व भय की भावना एकसाथ काम करती है कि उसे किसी सूत्र से बांधना संभव नहीं लगता। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

दुनिया के शेयर बाज़ारों की बनिस्बत अपने बाज़ार की उलट चाल की एक वजह यह भी है कि इधर अपने यहां स्थानीय कारक ज्यादा प्रभावी हो गए हैं। मई के लोकसभा चुनावों ने अभी से बाज़ार को अपने लपेटे में ले लिया है। बाज़ार को आभास हो चला है कि मोदी सरकार अपने भविष्य को लेकर काफी आशंकित है। इसलिए युद्ध का माहौल बनाकर उसको भी भुनाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

दिसंबर में जब से अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर बढ़ाकर 2.25 से 2.50% की है, तभी से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारत से निकलने लगे हैं। अकेले जनवरी महीने में उन्होंने भारतीय शेयर बाज़ार से 4262 करोड़ रुपए निकाले हैं। फरवरी में अभी तक उन्होंने शुद्ध खरीद की है। फिर भी कुल मिलाकर इस साल उनका खाता ऋणात्मक चल रहा है। उन्होंने इस दौरान बांडों से भी धन निकाला है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

पिछले हफ्ते सिंगापुर में एशिया में निवेश के अवसरों पर एक सम्मेलन हुआ। हालांकि यह वर्चुअल या ऑनलाइन सम्मेलन ही था। लेकिन इसमें दुनिया के मशहूर फंड मैनेजर जिम रोजर्स से लेकर कई निवेश व ट्रेडिंग संबंधी रिसर्च फर्मों से भाग लिया। यह जानकर काफी अचंभा हुआ कि उन्होंने साल 2019 में एशिया में निवेश के मौकों का जिक्र करते हुए चीन ही नहीं, बांग्लादेश तक का नाम लिया। पर भारत का नहीं। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

इस साल दुनिया के बाज़ारों से भारतीय बाज़ार के विपरीत दिशा में चलने की एक बड़ी वजह यह है कि हमारा बाज़ार पहले से ही काफी महंगा था तो निवेशक इसमें नई खरीद से बच रहे हैं। निफ्टी पहली जनवरी को 26.28 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा था। उसके बाद गिरा है। फिर भी 25 फरवरी को उसका पी/ई अऩुपात 26.53 रहा है क्योंकि कंपनियों के तिमाही नतीजे खराब रहे हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

इस समय भारतीय शेयर बाज़ार का हाल बड़ा विचित्र चल रहा है। आम तौर पर वह दुनिया के बड़े शेयर बाज़ारों के साथ ताल मिलाकर चलता रहा है। लेकिन फिलहाल उसकी चाल सबसे न्यारी है। इस साल अभी तक अमेरिका का डाउ जोन्स सूचकांक 11%, जापान का निक्केई 9%, चीन का शांघाई सूचकांक 12% और लंदन का फुटसी सूचकांक 7% बढ़ा है, जबकि अपना सेंसेक्स 3% गिरा है। आखिर यह उलट चाल क्यों? अब सोम का व्योम…औरऔर भी