मोदी सरकार है तो गठबंधन सरकार। लेकिन चूंकि भाजपा ने 2014 के चुनावों में अपने दम पर पूरा बहुमत पाया और चुनाव-पूर्व गठबंधन का कोई सदस्य इसके मंत्रिमंडल में नहीं है, इसलिए हम इसे एकदलीय सरकार मान सकते हैं। इसके कार्यकाल में औसत आर्थिक विकास दर नई सीरीज के मुताबिक 7.4% रही है जो पहले के पैमाने पर 1.5% कम 5.9% निकलती है। यह 39 सालों की औसत दर 6.3% से कम है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

पिछले 39 सालों में केंद्र में शासन करनेवाली दस सरकारों में से सात गठबंधन की मिलीजुली सरकारें थीं। इनमें से छह सरकारों ने उन तीन सरकारों से ज्यादा आर्थिक विकास दर हासिल की जो किसी एक दल के बहुमत में चलाई जा रही थीं। केवल दिसंबर 1989 से जून 1991 तक, जब केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार थी, तभी हमारी आर्थिक विकास दर कम रही थी। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

केंद्र में जनवरी 1980 से अक्टूबर 1984 तक इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की बहुमत सरकार थी। उस दौरान देश के जीडीपी की औसत विकास दर 5.9% थी। फिर नवंबर 1984 से दिसंबर 1989 तक राजीव गांधी की शानदार बहुमत वाली सरकार थी। हमारी अर्थव्यवस्था उन पांच सालों में औसतन 5.4% की सालाना दर से बढ़ी। जुलाई 1991 से मई 1996 तक नरसिम्हा राव की सरकार में औसत विकास दर 5.2% रही। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

केंद्र में एकदलीय सरकार हो या गठबंधन सरकार, 1980 के बाद अब तक के 39 सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था औसतन 6.3% सालाना की दर से बढ़ती रही है। इसमें मुद्रास्फीति का प्रभाव हटा दिया गया है। अगर उसका प्रभाव जोड़ दें तो हमारे जीडीपी की सालाना विकास दर लगभग 13% हो जाती है। इस 39 सालों में केंद्र में दस सरकारें रहीं जिनमें से केवल तीन सरकारें एक दल के बहुमत की थीं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

चुनावों के नतीजे यकीनन दो-चार, दस-पंद्रह दिन शेयर बाज़ार पर असर दिखाते हैं। लेकिन बाद में सब सामान्य हो जाता है। विदेशी निवेशकों के आने पर फर्क नहीं पड़ता, न ही घरेलू निवेशकों का जोश कमबेशी होता है। लंबे समय में भारत की विकासगाथा का दमखम बरकरार है तो शेयर बाज़ार तरन्नुम में उड़ता रहता है। केंद्र में एक दलीय बहुमत की सरकार हो या गठबंधन की सरकार हो, बाज़ार चहकता रहता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार मानकर चल रहा है कि चुनावों के बाद भाजपा दोबारा सत्ता में आएगी, भले ही एनडीए का बहुमत पहले से घट जाए। नतीजे इससे उलट हुए तो बाज़ार उस दिन भारी गिरावट का शिकार हो सकता है। 2004 में चुनाव परिणाम के दिन बाज़ार 15% से ज्यादा टूटा था। हालांकि 2009 में यूपीए के दोबारा चुने जाने पर 20% उछल गया था। लेकिन क्या चुनावी सन्निपात का असर ज्यादा खिंचता है? अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

तथ्य छिपाए जा रहे हैं। मतदाताओं को खींचने के लिए मनगढ़ंत बातें और डर फैलाया जा रहा है। हल्ला है कि सरकार बदली तो शेयर बाज़ार धराशाई हो सकता है। यह सारा शोर मचाया जा रहा है सत्ताधारी व सबसे अमीर पार्टी की तरफ से। वह अपने मकसद में कितना कामयाब होगी, यह तो 23 मई को नतीजे आने पर ही पता चलेगा। फिर भी हमें शोर और सच का अंतर समझना होगा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

इसमें कोई दो राय नहीं कि लाख हो-हल्ले के बावजूद हमारे चुनावों में कालाधन बड़ी अहम भूमिका निभाता है। एक अपुष्ट अनुमान है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में लगभग 18,000 करोड़ रुपए का कालाधन इस्तेमाल हुआ था। इसमें से अकेले भाजपा ने करीब 10,000 करोड़ रुपए खर्च किए थे। इस बार के लिए कुछ जानकारों का अनुमान है कि कालेधन का आंकड़ा आराम से 25,000 करोड़ रुपए के पार जा सकता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

चुनावी माहौल में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की अप्रत्याशित सक्रियता की वजह क्या है? इसकी जांच गहराई से होनी चाहिए। पर, मुख्यधारा का मीडिया ऐसा करेगा नहीं, बिजनेस चैनलों व अखबारों की भी इसमें कोई रुचि नहीं होगी, सरकार ऐसा करेगी नहीं और पूंजी बाज़ार नियामक संस्था सेबी भी शायद इस झंझट में न पड़ना चाहे। ऐसे में शक का उठना लाज़िमी है कि कहीं भारतीय धन ही तो घूमकर वापस नहीं आ रहा। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार में अजब उलटबांसी चल रही है। अनिश्चितता से भरे माहौल में विदेशी निवेशक अमूमन धन निकाल लेते हैं। अर्थव्यवस्था कमज़ोर होने पर यह गति ज्यादा ही तेज़ हो जाती है। लेकिन जिन एफआईआई ने साल 2018 में अपने बाज़ार से 33,014 करोड़ रुपए निकाले और इस साल जनवरी में भी 4262 करोड़ निकाल डाले, उन्होंने 20 फरवरी के बाद से कल तक 41,904 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीद की है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी