स्वतंत्र बाज़ार में सौदा संपन्न होने के लिए ज़रूरी है कि खरीदने और बेचनेवाले एकसाथ मौजूद हों। शेयर बाजार में हर पल यही होता है। कुछ लोग अपने शेयर बेचने पर उतारू रहते हैं, जबकि कुछ लोग उन्हें खरीदने को तत्पर रहते हैं। एक को लगता है कि इस वक्त बेचने में फायदा है क्योंकि शेयर यहां से ज्यादा नहीं बढ़नेवाला, जबकि दूसरे को लगता है कि शेयर यहां से जमकर बढ़नेवाला है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

जो हमारे मन में होता है, उसे ही हम अक्सर तथ्यों/आंकड़ों से पुष्ट करने में लगे रहते हैं बगैर यह परखे कि तथ्य/आंकड़े सचमुच क्या कह रहे हैं। मनोविज्ञान में इस प्रवृत्ति को कन्फर्मेशन बायस या पुष्टि पूर्वाग्रह कहते हैं। इस पूर्वाग्रह के चलते हम अपनी धारणा के खिलाफ जानेवाले हर तथ्य/आंकड़े को नकारते रहते हैं। यह प्रवृत्ति यकीनन गलत है। लेकिन इसके बिना शेयर बाज़ार में कोई काम ही नही हो सकता। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में लंबे निवेश का फैसला बहुच सोच-समझकर किया जाता है। लेकिन ट्रेडिंग में अक्सर हम आवेग में फैसला करते हैं। मन में बैठा है कि मुझे कभी घाटा नहीं खाना तो स्टॉप-लॉस के करीब आते ही हम भ्रम, डर व चिंता जैसी भावनाओं के शिकार हो जाते हैं। वहीं, मन में बैठा लिया कि स्टॉप-लॉस तो ट्रेडिंग के बिजनेस की लागत है तो ऐसी नकारात्मकता या तनाव की नौबत नहीं आएगी। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

नकारात्मक व नुकसानदेह भावनाओं को हवा देने वाली सोच की चेक-लिस्ट बड़े काम की होती है। हम जैसे-जैसे उस लिस्ट में दर्ज आदतों को काटते जाते हैं, हमारे अंदर डोपामाइन नाम के एक हार्मोन व न्यूरोट्रांसमिटर का स्राव शुरू हो जाता है। इससे आत्मसम्मान व आत्मविश्वास बढ़ता जाता है। साथ ही हम ऐसी नई आदतें सीखने लगते हैं जो ट्रेडिंग में हमारी सोच को वस्तुपरक बनाती हैं और हम लाभ कमाने लगते हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

अपनी सोच के उन सारे तत्वों की हमें चेक-लिस्ट बनानी होगी, जो ट्रेडिंग करते वक्त नकारात्मक भावनाओं को हवा देते हैं। इस चेक-लिस्ट के लिए कोई बना-बनाया फॉर्मूला नहीं है, बल्कि यह हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकती है। इसलिए इस पर हर ट्रेडर को खुद काम करना होता है। मन की गांठें खुद खोलनी पड़ती हैं। इन्हें खोलते ही कमाल होने लगता है और सब जानने की अहमन्यता टूटने लगती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार समेत वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग का अपना नियम-धर्म है। यह हमारी मान्यताओं व सोच से अलग है। ट्रेडिंग के दौरान हम अपनी सोच व मान्यताओं को एक तरफ रख दें और बाज़ार के वास्तविक पैटर्न व संतुलन को समझकर काम करें, तभी सफल हो सकते हैं। अन्यथा, बराबर विफल होने को अभिशप्त हैं। कम से कम हमें अपनी सोच के उन तत्वों को हटाना होगा जो नकारात्मक भावनाओं को उकसाते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

कोई कहे कि शेयर-ट्रेडिंग के दौरान बेहतर होगा कि सोचना बंद कर दें तो आप कहेंगे कि क्या बकवास है! सोचना तो ट्रेडिंग की समूची प्रक्रिया में चलता ही रहता है, उसे कैसे रोक सकते हैं! सही बात कि आप क्या और कैसे सोचते हैं, इससे आपकी ट्रेडिंग शुरू से अंत तक प्रभावित होती है। फिर भी इस सोचने पर बराबर नज़र रखनी चाहिए और उसे जितना संभव हो, उतना घटा देना चाहिए। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

स्टॉप-लॉस ट्रेडिंग के बिजनेस का अभिन्न हिस्सा है। इसको इस बिजनेस की लागत भी कहा जाता है। बड़े से बड़ा कामयाब ट्रेडर भी इससे बच नहीं पाता। लेकिन हम उसे स्वीकार नहीं कर पाते क्योंकि हमारे मन में गहरे बैठा है कि हमें कभी नाकाम नहीं होना, घाटा नहीं खाना है। इस विचार या मान्यता के चलते हम स्टॉप-लॉस की वास्तविकता को मनोवैज्ञानिक रूप से पचा नहीं पाते और तनाग्रस्त हो जाते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

हमारे विचारों, भावनाओं और बर्ताव से तय होता है कि हम ट्रेडिंग या दूसरी गतिविधि से क्या परिणाम हासिल करते हैं। विचार बनते हैं हमारी मान्यताओं, पूर्वाग्रहों, मूल्यों, दृष्टिकोण व रुझान से। जब भी किसी घटना पर हमारा ध्यान जाता है तो विचार सक्रिय हो जाते हैं और हमारा दिमाग फटाफट न्यूरोन्स दागना शुरू कर देता है। मसलन, स्टॉप-लॉस की नौबत आ जाए तो हम इस तरह घाटा खाना स्वीकार नहीं कर पाते। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

लालच व डर, यही दो भावनाएं हैं जिन पर शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग का सारा खेल चलता है। लेकिन ये भावनाएं हमारे अंदर आखिर काम कैसे करती हैं? एड्रेनल ग्लैंड की चर्चा हम पहले भी कर चुके हैं। यह हमारे मस्तिष्क में भावनाओं के स्रोत लिम्बिक सिस्टम में शामिल है। वहां इसके अलावा हिप्पोकैम्पस, हाइपोथैलमस, पिट्यूटरी व अमिगडाला जैसे अंग हैं। यही हमारे भीतर डर, चिंता व संदेह जैसे भाव पैदा करते हैं। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी