सब्ज़बाग को सब्ज़बाग कहना निराशावाद नहीं होता। पर प्रधानमंत्री मोदी 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था को सब्ज़बाग कहनेवालों को पेशेवर निराशावादी बता रहे हैं। मसला यह है कि यह लक्ष्य मोदी सरकार के नए कार्यकाल के आखिरी साल 2023-24 का नहीं, बल्कि उसके एक साल बाद का है। इसलिए लक्ष्य अधूरा रहा तो कह सकते हैं कि अभी तो एक साल बाकी है। दूसरे, 8% की विकास दर से इसकी गिनती गलत है। अब मंगल की दृष्टि..औरऔर भी

हमारी अर्थव्यवस्था इस साल 12% बढ़ी और 4% महंगाई घटा दें तो जीडीपी की वास्तविक विकास दर 8% रहेगी। अगले पांच साल भी इसी दर से जीडीपी बढ़ा तो वित्त वर्ष 2024-25 तक हमारी अर्थव्यवस्था 2.7 ट्रिलियन डॉलर के वर्तमान स्तर से बढ़कर 5 ट्रिलियन डॉलर की हो जाएगी। लेकिन एक्सेल शीट की गणना के मुताबिक 8% की दर से तब तक अर्थव्यवस्था 4.28 ट्रिलियन डॉलर ही होगी। बजट का लक्ष्य राम भरोसे। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

अर्थव्यवस्था से लेकर शेयर बाज़ार तक के लिए साल का सबसे महत्वपूर्ण दिन। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लोकसभा में 11 बजे बजट भाषण पेश करेंगी। जीएसटी लागू होने के बाद कर-प्रस्तावों का बहुत महत्व नहीं रह गया है। इसलिए सबकी निगाहें इस बात पर होंगी कि वे अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए क्या कदम उठाने जा रही हैं। बाज़ार यह देखेगा कि वे एनबीएफसी के तरलता संकट को कैसे दूर करती हैं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

हमें बहुत फर्क नहीं पड़ता कि सरकार टैक्स का धन खर्च करे या उधारी का। लेकिन आईएमएफ, विश्व बैंक, रेटिंग एजेंसियों, अर्थशास्त्रियों व विदेशी निवेशकों को इस बात से बहुत फर्क पड़ता है कि सरकार अपना खर्च पूरा करने के लिए कितना उधार ले रही है। यह स्थिति बजट में राजकोषीय घाटे से सामने आती है। इस बार अप्रैल-मई में ही अंतरिम बजट में तय राजकोषीय घाटे का 52% खर्च हो चुका है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

वजह चाहे जो हो, दहाई अंक के विकास का सपना 2018-19 की आखिरी तिमाही तक आते-आते जीडीपी के 5.8% बढ़ने तक सिमट गया। यह पांच साल की न्यूनतम विकास दर है। सरकार ने चुनावों के बाद आखिरकार मान लिया कि बेरोजगारी 45 सालों के उच्चतम स्तर तक पहुंच चुकी है। पांच सालों से देश का निर्यात जहां का तहां अटका रहा, वहीं घरेलू बचत दर 24% से घटकर 17% पर आ चुकी है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

पांच साल पहले मोदी सरकार आई तो लगा कि जल्दी ही वह अर्थव्यवस्था की विकास दर को दहाई अंक में ले जाएगी। 2014-15 की आर्थिक समीक्षा में तो बाकायदा ऐलान कर दिया गया कि भारत उस ऐतिहासिक मुकाम पर आ गया है जहां से वह दस प्रतिशत से ऊपर की विकास यात्रा शुरू कर सकता है। लेकिन फरवरी 2015 में की गई यह घोषणा बाद के चार सालों में दिवास्वप्न बनकर रह गई। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

अर्थव्यवस्था के सारे इंजिनों को एकसाथ फायर करनेवाले बजट की तारीख आ ही गई। फरवरी में तो अंतरिम बजट आया था जिसका मकसद चुनावों में सरकार की हवा बनाना था। मोदी सरकार की बम्पर जीत के बाद समूचे देश की उम्मीदें चरम पर हैं। कॉरपोरेट से लेकर व्यापारी, नौकरीपेशा लोग, किसान व गरीब तक अब हवा-हवाई नहीं, ठोस काम की उम्मीद लगाए बैठे हैं। वित्त मंत्री के सामने इस बार बड़ी चुनौती है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

मुश्किल यह है कि शेयर बाज़ार में लाख पारदर्शिता के बावजूद हम देख नहीं सकते कि हमारे सौदे के सामने कौन है। हम खरीद रहे तो कौन बेच रहा है और हम बेच रहे हैं तो खरीद कौन रहा है। लेकिन दैनिक व साप्ताहिक चार्ट पर भावों का पैटर्न देखकर सोचा-समझा अंदाज़ा लगाया जा सकता है। ऐसे पैटर्न की समझ हमें न्यूनतम रिस्क में जीत की अधिकतम संभावनावाले सौदे पकड़ना सिखा सकती है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सौदा करने से पहले सबसे ज़रूरी बात है यह समझना कि हम खरीद रहे हैं तो सामने से बेच कौन रहा है। लगे कि संस्थाएं या प्रोफेशनल ट्रेडर सामने से बेच रहे हैं तो फौरन सौदे से हाथ खींच लेना चाहिए क्योंकि तब हमारा दांव उल्टा पड़ने की आशंका बहुत ज्यादा नहीं, शत-प्रतिशत है। वहीं, अगर रिटेल ट्रेडर हमारा सौदा पूरा कर रहा है तो समझिए कि सफलता की संभावना बहुत ज्यादा है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

परम्परागत सोच से बाहर निकलने का सीधा-सरल तरीका यह है कि हम भावों के चार्ट को परखकर समझें कि डिमांड-सप्लाई का नियम क्या कह रहा है। अगर लगे कि उस वक्त के भाव पर बैंक, वित्तीय संस्थाएं व प्रोफेशनल निवेशक खरीद कर सकते हैं तो हमें भी खरीद का फैसला लेना चाहिए। वहीं, अगर शेयर सप्लाई ज़ोन में हो और संस्थागत निवेशक बेचकर मुनाफा कमाने की स्थिति में नजर आएं तो बेचना चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी