रिजर्व बैंक बराबर ब्याज दर घटा रहा है। फिर भी इस साल अप्रैल-जून की तिमाही में कॉरपोरेट क्षेत्र को 22.16% ज्यादा ब्याज अदा करना पड़ा। ये आंकड़ा 2179 कंपनियों के सैम्पल पर आधारित है। इन कंपनियों का शुद्ध लाभ इस दौरान 11.97% घट गया तो उन्होंने सरकार को 10.48% कम टैक्स दिया। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसमें उद्योग से लेकर उपभोक्ता और सरकार, सभी के सभी फंसे हुए नज़र आ रहे हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

आर्थिक विकास के चार इंजिन होते हैं। सरकारी खर्च, निजी निवेश, निजी खपत और निर्यात। इन चारों इंजिनों की हालत बड़ी संगीन दिख रही है। सरकार को टैक्स भरपूर नहीं मिल रहा तो वह खर्च कहां से बढ़ाएगी। उधार के लिए विदेश की शरण लेने तक की पेशकश हो चुकी है। विश्व अर्थव्यवस्था में मंदी के आसार हैं तो हम निर्यात बढ़ा नहीं सकते। बचा निजी निवेश और खपत तो वहां भी सन्नाटा! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अगर खुदा-न-खास्ता अमेरिका में मंदी आती है तो पूरी दुनिया पर इसका असर पड़ेगा। चीन, जापान व यूरोप में पहले से कमज़ोरी चल रही है। ऐसा होने पर भारतीय निर्यात के बढ़ने की रही-सही आशा भी खत्म हो जाएगी। वैसे भी अपना निर्यात सुस्ती का शिकार हो चुका है। चालू वित्त वर्ष 2019-20 से अप्रैल-जुलाई के पांच महीनों में यह साल भर पहले की समान अवधि की तुलना में मात्र 3.13% बढ़ा है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

आर्थिक मोर्चे से खराब खबरों का आना थम नहीं रहा। घरेलू अर्थव्यवस्था के बाद अब विदेश से भी चिंताजनक संकेत मिलने लगे हैं। अमेरिका में दशकों बाद छोटी अवधि के बांड लंबी अवधि के बांडों से सस्ते हो गए हैं यानी, छोटी अवधि के बांडों पर ज्यादा अवधि के बांडों से ज्यादा ब्याज मिलने लगी है। इसे आर्थिक मंदी का संकेत माना जाता है। हालांकि विशेषज्ञ कह रहे हैं कि मंदी नहीं आनेवाली। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

देश के वित्तीय जगत में एक ऐसा बम सुलग रहा है जो कभी भी फट सकता है। आईएल एंड एफएस का 90,000 करोड़ रुपए का घोटाला होता रहा, लेकिन हमारी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां आंख पर पट्टी बांधे रहीं। सरकार ने प्राइस वाटरहाउस कूपर्स पर 55 अभियोग ठोंक दिए, मगर सब कुछ शांति से चलता रहा। इधर सरकारी संस्थान स्टेट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन और इस्पात इंडस्ट्रीज के मालिक प्रमोद मित्तल का घोटाला चर्चा में है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को अर्थव्यवस्था की गंभीर हालत पर चिंता करनी ही पड़ी। उन्होंने उद्योगपतियों से बात की। बैंकरों व अर्थशास्त्रियों की भी राय ली। बताया जा रहा है कि उन्होंने अर्थव्यवस्था में जान फूंकने का पूरा रोडमैप तैयार कर लिया है, विस्तृत कार्यक्रम तैयार है। लेकिन सवाल उठता है कि इतनी ही समझदारी थी तो जुलाई में पेश किए गए इस साल के बजट में सार्थक उपाय क्यों नहीं किए गए? अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

देश की अर्थव्यवस्था और खपत का हाल गजब है। सोने के भाव रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं। फिर भी अपने यहां सोने का आयात इस साल अप्रैल-जून की तिमाही में 35.5% बढ़ गया। साल भर पहले की समान अवधि में इस पर खर्च विदेशी मुद्रा 8.45 अरब डॉलर थी, जबकि इस साल 11.45 अरब डॉलर रही है। इससे देश का व्यापार घाटा बढ़ गया। ऊपर से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक धन निकालते जा रहे हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

सरकार ध्यान भटकाने और लीपापोती में लगी है। लेकिन हकीकत यही है कि बम्पर बहुमत के बावजूद मोदी सरकार ने पहले बजट में जो ढीलापन दिखाया है, उससे उद्योग व निवेश जगत काफी निराश है। कहां तो उम्मीद थी कि वह बड़े स्तर के आर्थिक सुधार करेगी और कहां वह किसी चुनावी साल की तरह वोटरों को लुभाने की कसरत करती रही। इससे उनका जनादेश ही संदेह के घेरे में आ गया है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

इस बार जुलाई में शेयर बाज़ार का जो हाल रहा है, वह 17 सालों का सबसे बड़ा झटका है। सेंसेक्स जुलाई 2002 में 7.92% गिरा था। उसके बाद वह इस जुलाई में 4.86% गिरा है। यह पिछले साल अक्टूबर के बाद किसी भी महीने में आई सबसे तीखी गिरावट है। जुलाई में छोटी कंपनियों की हालत ज्यादा ही खराब रही। इस दौरान बीएसई मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांक क्रमशः 7.87% और 10.87% गिरे हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ना उपभोक्ता की मांग और ना ही निजी निवेश। ऐसे में आर्थिक विकास आएगा कहां से! जुलाई में हमारे यहां कारों की बिक्री साल भर पहले की बनिस्बत 30.62% गिर गई। यह वाहन उद्योग के लिए दो दशकों का सबसे खराब जुलाई माह रहा। इस दौरान हमारी सबसे बड़ी यात्री वाहन निर्माता कंपनी मारुति सुज़ुकी की बिक्री 36.71% घटी है। लगातार नौ महीनों से देश में यात्री वाहनों की बिक्री घट रही है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी