पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी के मुताबिक 31 अगस्त 2019 तक देश में 9416 विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक सक्रिय हैं। इन्हें FPI या FII भी कहा जाता है। इनके पास अगस्त में निवेश की खातिर 31.98 लाख करोड़ रुपए थे जिसका 86% यानी 27.52 लाख करोड़ रुपए इक्विटी या शेयरों के लिए था। इसमें सबसे ज्यादा धन अमेरिका और उसके बाद फर्जी धन के गढ़ कहे जानेवाले मॉरीशस, लक्ज़मबर्ग व सिंगापुर से आया है। अब मंगल की दृष्टि…और भीऔर भी

पहले देश में विदेशी वस्तुओं का क्रेज़ था। अब विदेशी पूंजी का क्रेज़ चढ़ गया है। इसे खींचने की लालसा आमलोगों से कहीं ज्यादा सरकार में है। हमारे प्रधानमंत्री खुद घूम-घूमकर विदेशी निवेशकों को न्यौता दे रहे हैं और कह रहे हैं कि उन्हें कोई दिक्कत होगी तो वे संभाल लेंगे। विदेशियों से इतना अपनापा ठीक नहीं क्योंकि वे भारत या भारतवासियों का नहीं, अपना फायदा देखकर ही यहां धन लगा रहे हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

दिक्कत यह है कि आम भारतीय जिस एलआईसी को गाढ़े-वक्त का साथी मानते हैं, उसे हमारी सरकार ने अपना एटीएम बना रखा है। जहां कहीं निवेश करना हो, वह एलआईसी की गाढ़ी निधि का सहारा लेने लगी है। यहां तक कि सरकारी कपंनियों के शेयर बेचने या विनिवेश के कार्यक्रम में कोई नहीं मिला तो सारी बिक्री एलआईसी के मत्थे मढ़ दी जाती है और एलआईसी को मजबूरन उनका दाम चुकाना पड़ता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

एलआईसी के प्रति आम भारतीय निवेशकों में अविश्वास पैदा करना लगभग असंभव है। बैंकों व पोस्ट ऑफिस की सुरक्षित जमा के बाद लोगों के जेहन में एलआईसी का ही नंबर आता है। आम भारतीय पीढ़ियों से एलआईसी की पॉलिसी को सोने या फिक्स डिपॉजिट रसीद की तरह लॉकर में सुरक्षित रखते आए हैं। यह अलग बात है कि वे इसे निवेश मानते हैं, जबकि असल में वह जोखिम का बीमा कवच मात्र है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

पिछले हफ्ते कांग्रेस ने एक प्रेस कांफ्रेंस में दावा किया कि सरकार एलआईसी के धन का दुरुपयोग कर रही है और किसी दिन हालत ऐसी हो सकती है कि एलआईसी को बंद करना पड़ जाए। लेकिन यह आशंका काफी अतिरंजित लगती है। फिलहाल एलआईसी का बिजनेस मॉडल सुरक्षित नज़र आता है। वह अपने कुल निवेश का लगभग 65% हिस्सा केंद्र व राज्य सरकार के सुरक्षित व अधिक ब्याज वाले बॉन्डों में लगाती है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

चालू वित्त वर्ष 2019-20 में एलआईसी को 3.49 लाख करोड़ रुपए का निवेश करना है। यह रकम वह सरकारी प्रतिभूतियों, कॉरपोरेट बांडों व शेयरों समेत पूंजी बाज़ार के सभी प्रपत्रों में लगाएगा। इसमें से कितना धन कहां लगाया जाएगा, इसका पता नहीं। लेकिन बीते वित्त वर्ष 2018-19 में उसने 2 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा केंद्र व राज्य सरकारों के बॉन्डों में लगाए थे और उन पर लगभग 8.25% का रिटर्न कमाया था। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में सारा प्रायोजित खेल चल रहा है। चौंकाने वाला तथ्य है कि शुक्रवार को वित्त मंत्री की घोषणा के बाद जब सेंसेक्स व निफ्टी 5.32% उछल गए, तब बाज़ार के सबसे उस्ताद खिलाड़ी विदेशी निवेशक संस्थाओं ने मात्र 35.78 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीद की। वहीं, देशी संस्थागत निवेशकों ने 3001.32 करोड़ रुपए की भारी शुद्ध खरीद की। इन देशी संस्थाओं में एलआईसी को ही सबसे बड़ा मोहरा बनाया जाता है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

एलआईसी बीमा व्यवसाय के निजीकरण के करीब दो दशक बाद भी देश की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी बनी हुई है। यह आम भारतीयों में जमी उसकी साख का प्रताप है। इससे पता चलता है कि करोड़ों भारतीय अपने जीवन का रिस्क कवर करने के लिए उस पर कितना भरोसा करते हैं। लेकिन कमाल की बात यह है कि वह देश में सबसे ज्यादा रिस्कवाले शेयर बाज़ार की सबसे बड़ी निवेशक भी है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

वित्त वर्ष 2018-19 में शेयर बाज़ार से एलआईसी का लाभ भले ही घट गया हो, लेकिन मार्च 2019 में उसके निवेश का बाज़ार मूल्य 28.74 लाख करोड़ रुपए रहा जो उससे पहले के वित्त वर्ष 2017-18 में उसके निवेश के बाज़ार मूल्य 26.46 लाख करोड़ रुपए से 8.62% ज्यादा है। साथ ही 2018-19 में उसकी कुल आस्तियां पहली बार 30 लाख करोड़ रुपए के पार जाकर 31.11 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गईं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

एलआईसी ने बीते वित्त वर्ष 2018-19 में शेयर बाज़ार में कुल 68,621 करोड़ रुपए लगाए थे। इस पर उसने 23,621 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया। लेकिन इससे पिछले वित्त वर्ष 2017-18 में उसने बाज़ार से 25,646 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया था, जबकि तब सेंसेक्स 3348 अंक बढ़ा था। इससे बाद के वर्ष में सेंसेक्स के 5417 अंक या 17% बढ़ने पर भी एलआईसी का बाज़ार से लाभ घट जाना अशुभ संकेत है। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी