जो एसबीआई पहले सरकार का पक्ष लेकर अभी तक अर्थव्यवस्था की हालत अच्छी बताता रहा था, वह भी अब अपना टेम्पो नहीं बनाए रख पा रहा है। वह सबसे बड़ा बैंक और सरकारी ही नहीं, सरकार के सारे खाते संभालने वाला बैक भी है। जहां सब उम्मीद कर रहे थे कि पहली तिमाही में 5% तक डूबी विकास दर दूसरी तिमाही में 5.5% हो सकती है, वहीं एसबीआई का अनुमान 4.2% का है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

इस बार का त्योहारी सीज़न खराब रहा। आम उपभोक्ता से लेकर उनके लिए सामान बनानेवाली कंपनियों के लिए। फिर भी इसे तात्कालिक मामला मानकर छोड़ा जा सकता है। लेकिन जब देश मे डीजल से लेकर बिजली तक की मांग घट रही हो और आंकड़े इसकी तस्दीक कर रहे हों तो यह गंभीर चिंता का मसला बन जाता है। शेयर बाज़ार भले ही ऊपर से बेफिक्र दिखे, लेकिन अंदर-अंदर उसकी भी हालत खराब है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अर्थव्यवस्था की हालत सुधर नहीं रही तो सभी निवेशक सुरक्षित ठिकानों की तरफ भाग रहे हैं। उन्हें स्थापित व बड़ी कंपनियों में सुरक्षा दिखती है जो निफ्टी व सेंसेक्स में शामिल हैं। आम निवेशकों के धन से बने म्यूचुअल फंड भी मंहगे हो जाने के बावजूद इन्हीं में निवेश बढ़ा रहे हैं। पिछले 22 महीनों में उन्होंने बाज़ार में 1.78 लाख करोड़ रुपए डाले हैं, जबकि एफआईआई निवेश 37,381 करोड़ रुपए रहा है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार में पिछले 22 महीनों में सबसे ज्यादा मार स्मॉल और मिडकैप स्टॉक्स को झेलनी पड़ी है। जहां विदेशी व देशी धन लार्जकैप कंपनियों की तरफ बहता रहा, वहीं स्मॉल व मिडकैप कंपनियों का कोई पुछत्तर नहीं रहा। इससे अच्छा बिजनेस कर रही छोटी व मध्यम कंपनियों के भी शेयर गिरते रहे। उनसे और ज्यादा निवेश निकला, जबकि बड़ी कंपनियों में निवेश बढ़ता ही गया और उनके शेयर चढ़ते ही गए। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

धन के प्रवाह से पूरा शेयर बाज़ार नहीं, उसका छोटा-सा हिस्सा चढ़ा है। एनएसई की 1500 से ज्यादा कंपनियों के एक सैम्पल के अध्ययन से पता चलता है कि उनके शेयरों के भाव जनवरी 2018 के बाद से औसतन 44% गिर चुके हैं। इस गिरावट का मध्यमान या मीडियन निकालें तो वह 53% निकलता है। हां, इतना जरूर है कि शीर्ष की 100 कंपनियों में से 55 के शेयर जमकर चढ़ गए हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

चालू वित्त वर्ष 2019-20 में अब तक म्यूचुअल फंड उद्योग में प्रति माह औसतन 9.24 लाख एसआईपी खाते जुड़े हैं। इनमें से हर एसआईपी खाते से महीने में होनेवाला औसत निवेश 2900 रुपए का है। फिलहाल स्थिति यह है कि म्यूचुअल फंडों को प्रति माह एसआईपी से लगभग 8000 करोड़ रुपए का निवेश मिल जा रहा है। माल कम बिक रहा हो, अर्थव्यवस्था सुस्त हो, फिर भी बाज़ार में निवेश आ रहा है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

एसआईपी का मतलब सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान। रिटेल निवेशकों को नियमित निवेश का यह तरीका काफी भा गया है। जनवरी 2019 शुरू से सितंबर 2019 अंत तक हमारे शेयर बाज़ार में एसआईपी के माध्यम से 1.62 लाख करोड़ रुपए का निवेश आया है। म्यूचुअल फंडों के पास इस समय 2.84 करोड़ एसआईपी खाते हैं जिसमें निवेशकों के बैंक खाते से नियमित रूप से धन खुद कटकर फंड स्कीमों में चला जाता है। अब करते हैं शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

एफआईआई का निवेश जब ठंडा पड़ा था, तब देशी म्यूचुअल फंडों ने शेयर बाज़ार में जमकर निवेश किया। ताज़ा आंकडों के मुताबिक जनवरी 2018 से सितंबर 2019 तक उन्होंने शेयरों में 1.73 लाख करोड़ रुपए का शुद्ध निवेश किया है। यह एफआईआई के निवेश से 6.4 गुना ज्यादा है। यह दिखाता है कि आम निवेशक म्यूचुअल फंडों के जरिए शेयर बाज़ार में निवेश करते जा रहे हैं। इसमें बड़ा योगदान एसआईपी का है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

विदेशी संस्थागत निवेशकों का रुख अक्टूबर से जाकर पलटा है। अन्यथा, वे जनवरी 2018 से लेकर 21 महीनों तक भारतीय शेयर बाज़ार से बराबर धन निकालने के ही मूड में नज़र आए। फिर भी इस दौरान सेंसेक्स व निफ्टी 15% से ज्यादा कैसे और क्यों बढ़ गए? रिटेल निवेशक तो इस दौरान मिडकैप और स्मॉलकैप स्टॉक्स को लग रही मार से धराशाई हुए पड़े थे। फिर किसने चढ़ाया बाज़ार के संवेदी सूचकांकों को? अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

जो भी निवेशक ट्रेडिंग से कमाना चाहते हैं, उन्हें एक बात भलीभांति समझ लेनी चाहिए कि धन का प्रवाह रोजमर्रा के शेयर बाज़ार को चलाता है। आपने जान लिया कि बाज़ार में किस तरफ धन बह रहा है और उसकी वजह क्या है तो आप दूसरों से एक कदम आगे पहुंच जाते हैं। यही एक कदम आगे निकलना आपको औरों पर बीस साबित कर देता है और बाज़ी आपके हाथ लग जाती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी