इस वक्त शेयर बाज़ार की हालत नाजुक है। अफवाह या किसी नकारात्मक खबर से उसे खुदा-न-खास्ता तगड़ा धक्का लगा तो संभालने के एफआईआई भी नहीं हैं। वे क्रिसमस की लंबी छुट्टियां मनाने निकल चुके हैं। सरकार किसान आंदोलन से परेशान है। वहीं, पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी सुस्त पड़ी है। पिछले कुछ महीनों में फ्रैंकलिन टेम्प्लेटन जैसे नामी म्यूचअल फंड और डेढ़ दर्जन ब्रोकरों के डिफॉल्ट हो गए। मगर सेबी शांत पड़ी रही। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

पिछले महीने लगातार दो बार वॉट्स-एप्प के ज़रिए अफवाह फैलाई गई कि निफ्टी व सेंसेक्स में शामिल बड़ी कंपनी के मालिक की सेहत बेहद नाज़ुक है। कंपनी ने इसका माकूल जवाब देकर अफवाह का समूल खात्मा कर दिया। पहले भी तेज़ी के दौर में अफवाहों से बाज़ार को गिराने की कोशिशें हो चुकी हैं। 1990 के दशक में तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के इस्तीफे या खराब सेहत की अफवाहें फैलाई गई थीं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

ताश के पत्तों का महल बन चुके शेयर बाज़ार को झटका देश नहीं, विदेश से भी लग सकता है। पिछले हफ्ते तक वेब या सोशल मीडिया की अटकलबाज़ी चल रही थी। अब तो कोरोना के नए खतरनाक अवतार ने ब्रिटेन, इटली व नीदरलैंड जैसे यूरोपीय देशों में धमक पैदा कर दी है। भारत समेत दुनिया के तमाम देशों ने ब्रिटेन से आनेवाली उड़ानें रद्द कर दी हैं। अफरातफरी का आलम गहराने लगा है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार हर दिन नए शिखर पर। निफ्टी 37.84 के रिकॉर्ड पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है, जबकि सेंसेक्स 33.60 के पी/ई पर। एक रुपए के शुद्ध लाभ पर इतना दाम देने का कहीं कोई तुक या औचित्य नहीं दिखता। औसतन 20-22 का पी/ई अनुपात चलता है। लेकिन विदेशियों ने सस्ते धन से बाज़ार को पाटकर भयंकर असंतुलन पैदा कर दिया है। ऐसा असंतुलन, जिसमें जरा-सी अफवाह भयंकर अफरातफरी मचा सकती है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अमूमन दिसंबर तेजड़ियों का महीना रहता है। लेकिन जनवरी के साथ ऐसा नहीं है। अबकी बार तो और भी नहीं। दुनिया में तमाम राजनीतिक घटनाक्रम आसन्न हैं जो वित्तीय जगत व बाज़ार को प्रभावित कर सकते हैं। जनवरी में यकीनन शेयर बाज़ार में वोल्यूम बढ़ जाएगा। इंट्रा-डे वोलैटिलिटी तो अब भी बढ़ी हुई है। लेकिन तब दिन-ब-दिन की वोलैटिलिटी भी वापस लौट आएगी। ट्रेडरों और निवेशकों को तब अपनी चौकसी बढ़ा देनी होगी। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

इतना निवेश कर चुकने के बाद विदेशी निवेशक इस महीने धीरे-धीरे सुस्ती ओढ़ते जा रहे हैं। इससे बाज़ार में नकदी या लिक्विडटी के कम होते जाने का रिस्क बढ़ता जा रहा है। कैश और डेरिवेटिव सेगमेंट में घटते वोल्यूम में यह दिखने भी लगा है। वैसे, हर साल दिसंबर में ऐसा होता रहता है। इससे बड़े ट्रेडरों को ऑर्डर पूरा करने में काफी दिक्कत होती है। लेकिन छोटों पर खास फर्क नहीं पड़ता। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार में विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) बाहर से लाकर सस्ता धन डालते जा रहे हैं। इस साल जनवरी से कल तक उन्होंने हमारे बाज़ार के कैश सेगमेंट में 1,46,377 करोड़ रुपए डाले हैं। वहीं, नवंबर तक के 11 महीनों में म्यूचुअल फंडों ने 28,000 करोड़ रुपए निकाले थे। दिसंबर में कल तक उसके साथ देशी संस्थाओं ने 23,015 करोड़ रुपए और निकाले हैं। जाहिर है सारा गुब्बारा एफआईआई ने फुलाया है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

हर कोई यही बोल रहा है कि शेयर बाज़ार में तेज़ गिरावट आ सकती है। लेकिन जानकारों के मुताबिक, इस महीने ऐसा होने की आशंका बहुत कम है। दरअसल, दिसंबर में म्यूचुअल फंड से लेकर विदेशी निवेशक तक मुनाफा समेटने में व्यस्त रहते हैं। एफआईआई की दिलचस्पी धीरे-धीरे बाज़ार की ट्रेडिंग या निवेश में घटती रही है। उनकी नज़र क्रिसमस की छुट्टियों पर है। वे नए साल में जनवरी से ही सक्रियता बढ़ाएंगे। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

साल खत्म होने में अब ढाई हफ्ते ही बचे हैं। इसी दौरान देशी म्यूचुअल फंडों से लेकर विदेशी निवेशक संस्थाओं (एफआईआई) तक को अपना हिसाब-किताब सेटल करना होता है। इस संस्थागत निवेशकों का यह रूटीन काम है। लेकिन इसका शेयर बाज़ार पर अहम प्रभाव पड़ता है। दिसंबर म्यूचुअल फंडों के लिए तीसरी तिमाही का अंत है तो वे एनएवी बढ़ाने में जुटे रहेंगे। वहीं, एफआईआई कैलेंडर वर्ष के हिसाब से ही चलते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

टेक्निकल एनालिसिस में माना जाता है कि शेय़रों में 52 हफ्ते का शिखर प्रतिरोध/रजिस्टेंस का काम करता है और वहां से उसके भाव गिर सकते हैं। लेकिन फिलहाल यह नियम काम नहीं कर रहा। भारत ही नहीं, सारी दुनिया का यही सूरते-हाल है। बहस छिड़ी है कि बाज़ार शक्तियों को अर्थव्यवस्था के कोविड-19 से उबर आने का इतना भरोसा क्यों है? कहीं पलटकर कोरोना ने फिर से कहर बरपाना शुरू कर दिया तो! अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी