विज्ञान में अधिकतम उपलब्ध डेटा की थाह में पहुंचकर ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है। उसी से अगला एक्शन या कदम तय होता है। लेकिन ट्रेडिंग विज्ञान ही नहीं, कला भी है। ग्लोबल हो चुका शेयर बाज़ार हर दिन इतना डेटा फेंकता है कि उनका विश्लेषण बेहद परिष्कृत सॉफ्टवेयर ही कर सकता है। इंसान तो डेटा के इस अम्बार में डूबता-उतराता ही रह जाएगा और अंततः कन्फ्यूज़ हो जाएगा। वैसे भी बाज़ार में पक्का कुछ नहीं,औरऔर भी

जो वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग का सार नहीं समझते, वे कभी इसे अंदाज़ का कमाल, किस्मत का खेल या सही बिजनेस टीवी चैनल का प्रताप बता सकते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग शुद्ध रूप से दांव-पेंच का खेल है। आप औरों पर ज़रा-सा भी भारी पड़े तो बाज़ी आपके ही हाथ लगती है। यह अलग बात है कि लगातार स्टॉक्स पर काम करते-करते एक तरह का इन्ट्यूशन विकसित हो जाता है औरऔरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में अपनी धार खुद विकसित करनी होती है। हम किसी की नकल नहीं कर सकते। पद्धति व तरीका तो सबसे पास समान होता है। उन्नीस-बीस का फर्क। इसे हमें अपनी बुनावट के हिसाब से कसना, साधना पड़ता है। अंततः हमारे हुनर में निखार अभ्यास से आता है। यहां हर कोई अपनी ही गलतियों से सीखता हुआ आगे बढ़ता है। धीरे-धीरे एक दिन बाज़ार की प्रायिकताओं से खेलने और उनको साधने का विज्ञान सीखऔरऔर भी

ट्रेडिंग में अलग धार कैसे लाई जाए? इसके लिए पहले यह धारणा मन से निकाल देनी होगी कि सॉफ्टवेयर आधारित एल्गोरिदम ट्रेडिंग किसी इंसान के दिमाग को मात दे सकती है। फिर, बाज़ार के अलग-अलग सेगमेंट हैं। ज़रूरी नहीं कि हर तरफ हाथ-पैर मारा जाए। ध्यान रहे कि दो-चार दिन में शेयरों के भाव का बढ़ना-घटना उनकी तरफ आते या उनसे दूर जाते धन के प्रवाह पर निर्भर है। अगर कोई धन के आने-जाने का यह समीकरणऔरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग किताबी ज्ञान नहीं, बाज़ार की पल-पल बदलती व्यावहारिक हकीकत से चलती है। यहां हर पल लालच और डर की इंसानी भावनाएं हिलोर मारती रहती हैं। ठंडी गणनाओं पर काम करनेवाले ट्रेडिंग सॉफ्टवेयर भी सक्रिय हैं। लेकिन उनके पीछे सक्रिय इंसान है और जीतता भी इंसान है अपनी धार की बदौलत। यह भी अकाट्य सच है कि हरेक इंसान की अपनी अलग धार होती है। सारा कुछ पढ़ने, सीखने व जानने के बाद आपऔरऔर भी

सालों-साल से यही कड़वा सच है कि शेयर बाज़ार में 95% (ज्यादातर रिटेल) ट्रेडर घाटे में रहते हैं, जबकि केवल 5% ट्रेडर कमाते हैं। ऐसा तब, जब इस समय ट्रेडिंग सीखने की किताबों से लेकर यू-ट्यूब चैनल भरे पड़े हैं। ट्रेडिंग सिखानेवाले गुरुओं की भी कमी नहीं जो खुद ट्रेडिंग से नहीं कमा पाते तो सिखाने का धंधा चलाने लगते हैं। हर छात्र से प्रतिमाह 35,000 से 50,000 रुपए। ऑनलाइन ट्रेडिंग एकेडमी तो डेढ़-दो लाख लेती है।औरऔर भी

इधर रिटेल निवेशक/ट्रेडर जहां एक तरफ शेयर बाज़ार में सीधा निवेश बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ म्यूचुअल फंडों की इक्विटी स्कीमों से धन निकाल रहे हैं। दिसंबर 2020 में म्यूचुअल फंडों की इक्विटी स्कीमों से 13,121 करोड़ रुपए निकले थे, जबकि जनवरी 2021 में यह रकम 12,194 करोड़ रुपए रही है। सवाल उठता है कि क्या रिटेल निवेशकों का आत्मविश्वास इतना बढ़ गया है कि म्यूचुअल फंड का सुरक्षित रास्ता छोड़कर सीधे निवेश का जोखिम उठानेऔरऔर भी

इधर बाज़ार में रिटेल निवेशकों की सक्रियता बढ़ने से डिलावरी आधारित सौदे ज्यादा हो रहे हैं। वे भले ही कम मात्रा में खरीदें, लेकिन ऐसे लाखों निवेशकों की खरीद से शेयरों के भाव चढ़ जा रहे हैं। नतीजतन, फ्चूचर्स के भावों को कैश सेगमेंट के भावों से पीछे दौड़ना पड़ता है। लेकिन यह सिलसिला आखिर कब तक चलेगा। रिटेल ट्रेडरों/निवेशकों की रीत है कि वे अमूमन चोटी पर खरीदते और तलहटी पर बेचते हैं। यही वजह हैऔरऔर भी

रिटेल ट्रेडर टिप्स और भावों के पीछे भागता है। सलाहकार और ब्रोकर अक्सर उसे वही स्टॉक्स खरीदने को कहते हैं जो पहले से चढ़ चुके होते हैं। लेकिन काश, शेयर बाज़ार में भावों की गति इतनी आसान होती! यकीनन, कैश व डेरिवेटिव सेगमेंट आपस में गुंथे हुए हैं और डेरिवेटिव्स कैश में चल रहे भावों की छाया होते हैं। लेकिन डेरिवेटिव सेगमेंट अब इतना बड़ा व स्वतंत्र हो गया है कि पलटकर कैश सेगमेंट को नचाने लगाऔरऔर भी

रिटेल ट्रेडरों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि वे लालच की भावना में डूबकर बाज़ार में उतरते हैं और बिकवाली की स्थिति में फौरन घबराकर बेचने लगते हैं। कंपनियों के 100, 200 या 300 शेयर खरीदते हैं और तब खरीदते हैं जब बाज़ार अपने उफान पर होता है। जब समझदार निवेशक, संस्थाएं, प्रोफेशनल ट्रेडर खरीद चुके हैं तब रिटेल ट्रेडरों की एंट्री होती है। तब अखबार व पत्रिकाओं से लेकर बिजनेस चैनल और ब्रोकरों की टिप्सऔरऔर भी