उठती ज्वाला और गिरते चाकू को पकड़ने की कोशिश कभी ना करें। शेयर बाज़ार में ऐसा एडवेंचर दिखाना उसी तरह है कि आप शेर से लड़ जाएं और शेर आपको खा जाए। इसलिए ट्रेडिंग में हमेशा ‘2% और 6% के अकाट्य मंत्र’ का पालन करना ज़रूरी है। हर सौदे में पहले से स्टॉप-लॉस लगाकर चलें। एक सौदे में 2% से ज्यादा घाटा नहीं और महीने में कुल 6% का घाटा लग गया तो पूरे महीने ट्रेडिंग सेऔरऔर भी

हम रिटेल ट्रेडरों की कुछ सीमाएं हैं जिन्हें भलीभांति समझ लेना चाहिए। मसलन, हम कभी खबरों पर ट्रेड नहीं कर सकते। कारण, खबरें जब तक विभिन्न सूचना माध्यमों से हम तक पहुंचती हैं, तब तक बाज़ार उन्हें जज़्ब कर चुका होता है। कंपनियों के नतीजे घोषित होने से पहले ऑपरेटरों तक पहुंच चुके होते हैं। इनमें खुद कंपनियों के प्रवर्तक तक शामिल होते हैं। इनसाइडर ट्रेडिंग भले ही अपराध हो। लेकिन ज़मीनी हकीकत है कि यह अपराधऔरऔर भी

रिटेल ट्रेडरों की श्रेणी में प्रोफेशनल ट्रेडर और एचएनआई भी आते हैं। प्रोफेशनल और एचएनआई ट्रेडर हमेशा बड़ी समझदारी से चलते हैं। वे धन का सार, उसका सारा चक्र सममझते हैं। हमारे-आप जैसे फुटकर ट्रेडर ही उथला व अधकचरे ज्ञान लेकर भावना में बहे चले जाते हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि न तो हमारे पास इफरात पूंजी होती है और न ही पर्याप्त धैर्य। फटाफट नोट बनाने की मानसिकता हमें पानी पर पड़े सोडियम कीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में चढाई का रुख मुख्य रूप से देशी-विदेशी निवेशक संस्थाएं, बैंक व प्रोफेशनल ट्रेडर तय करते हैं। लगभग 90% चढ़ान इन्हीं की बदौलत तय होती है। फिर ये अपनी खरीद थामकर बैठ जाते है। बाकी 10% चढ़ाई रिटेल निवेशक पूरी तरह करते हैं। इनकी खरीद के दौरान संस्थागत व प्रोफेशनल निवेशक ताश के पत्ते फेंटते रहते हैं। लेकिन उसके बाद बाज़ार के गिरने का रुख केवल और केवल बाज़ार के 95% रिटेल निवेशक/ट्रेडर करते हैं।औरऔर भी

ट्रेडिंग करते वक्त हमें दो खास बातों का ध्यान रखना चाहिए। एक, सामनेवाले ट्रेडर का मनोविज्ञान और दो, बाज़ार में आ रहे धन का प्रवाह। मनोविज्ञान का पता भावों का ट्रेन्ड और टेक्निकल एनालिसिस के विभिन्न इंडीकेटर बता देते हैं। कैंडल के आकार और उनकी पोजिशन से ही काफी कुछ पता चल जाता है, बशर्ते उनकी भाषा आपको पढ़नी आती हो। मौजूदा चढ़े हुए बाज़ार में रिटेल ट्रेडरों की मानसिकता काफी मायने रखती है। अन्यथा, सामान्य बाज़ारऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में पिछले 12-14 महीनों में करीब डेढ़ करोड़ नए-नवेले रिटेल ट्रेडर आए हैं। इन्हें भरोसा है कि यहां धन-दनादन होता है। उनके दिमाग पर तेज़ी का शुरूर छाया है। उन्होंने अभी तक बाज़ार की मंदी नहीं देखी। इनमें से ज्यादातर पिछले साल मार्च में तब बाज़ार में आए, जब वो कोरोना की मार से ज़मींदोज़ हो चुका था। उसके बाद अभी तक तेज़ी की बहार है। लेकिन अगर बाज़ार में मुनाफावसली की लहर दौड़ी औरऔरऔर भी

आज के दौर की सबसे बड़ी समझदारी यही है कि बेहद सतर्क रहें, हमेशा तगड़ा स्टॉप-लॉस लगाकर चलें। ऐसा इसलिए ज़रूरी है क्योंकि बाज़ार में इस वक्त 20-30 साल के युवा झूमकर आए हैं। इनके पास शेयरों में ट्रेडिंग का कोई अनुभव नहीं है और वे बुद्धि से ज्यादा भावनाओं में बहते हैं। खट से इधर तो खटाक से उधर। नतीजतन, बाज़ार कोई दिशा ही नहीं पकड़ पा रहा और उन्मत्त जानवर जैसा बर्ताव कर रहा है।औरऔर भी

लम्बे निवेश की बात अलग है। लेकिन शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में धन के प्रवाह के साथ बहेंगे, तभी कमा सकते हैं। विपरीत चले तो पूंजी गंवाते रहेंगे। इस समय हमारा बाज़ार चूंकि रिटेल ट्रेडरों की पिनक या सनक के साथ बह रहा है, इसलिए हर किसी को उनके मनोविज्ञान को समझकर चलना होगा। दिक्कत यह है कि वे समझदारी या बगैर किसी योजना के लालच या डर की भावना के वशीभूत होकर चलते हैं तो कैसेऔरऔर भी

पहले जहां साल भर में 40-50 लाख नए डीमैट एकाउंट खुला करते थे, वहीं पिछले 14 महीनों में करीब 1.50 करोड़ नए डीमैट एकाउंट खुले हैं। इन्हें मिलाकर बीएसई के डेटा के मुताबिक देश में कुल डीमैट खाताधारकों की संख्या 7.06 करोड़ हो चुकी है। ये लोग 10-20, 50-100 शेयर या डेरिवेटिव सेगमेंट में अधिकतम दो-चार लॉट ही खरीदते हैं। लेकिन कई करोड़ निवेशकों/ट्रेडरों की ऐसी छोटी खरीद भी मिलकर विशाल हो जाती है। इसका प्रभाव शेयरोंऔरऔर भी

कोरोना के प्रकोप और लॉकडाउन ने हमार शेयर बाज़ार का स्वरूप ही बदल दिया है। पहले जहां रिटेल ट्रेडरों का रोल हाशिये पर था, वहीं अब वे काफी निर्णायक हो गए हैं। खासकर, डेरिवेटिव सेगमेंट में तो वे एफआईआई, डीआईआई व ब्रोकरों की प्रॉपराइटरी फर्मों से भी बड़े खिलाड़ी बन गए हैं। मसलन, शुक्रवार की ट्रेडिंग पर नज़र डालें तो एनएसई के डेरिवेटिव सेगमेंट में कुल 73.13 लाख लॉन्ग सौदे हुए, जिसमें से 43.65 लाख सौदे (59.69%)औरऔर भी