शेयर बाज़ार के चक्रों को जज्ब कर लिया और उसकी दशा-दिशा पकड़ ली तो समझो कि पहला अध्याय पूरा कर लिया। छमाही, तिमाही से लेकर महीने, हफ्ते व दिन तक का चक्र। महीने के पहले हफ्ते में भरपूर जोश व उत्साह रहता है। ट्रेडर पुरानी पोजिशन को बराबर करने के बाद नई पोजिशन शुरू करते हैं। दूसरा हफ्ता शांत रहता है। तीसरे हफ्ते से पोजिशन को रोल या स्क्वायर करना शुरू हो जाता है। डेरिवेटिव सौदों केऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के सफल ट्रेडर को हमेशा प्रवाह के साथ चलना होता है। तभी वह कमाई कर पाता है। अगर कोई ट्रेडर प्रवाह के विपरीत चलने की ‘क्रांतिकारिता’ दिखाता है तो उसकी ट्रेडिंग पूंजी बिना कोई समय गवांए शहीद हो जाती है। इसलिए कहा जाता है कि बाज़ार हमेशा सही होता है और ट्रेडर को उससे फालतू तर्क-वितर्क और बहस नहीं करनी चाहिए। लेकिन लम्बे समय के निवेशक को कतई इस तरह की भेड़चाल का शिकार नहींऔरऔर भी

शेयर बाजार चक्रों में चलता है। इसको ध्यान में रखते हुए ही टेक्निकल एनालिसिस में मूविंग औसत के दिन तय किए जाते हैं। मकसद होता है कि चक्रों के उतार-चढ़ाव को सही तरीके से पकड़ा जाए। गलत हिसाब लगाया तो धोखा। मसलन, एक्पोनेंशियल मूविंग औसत 5, 13 व 20 दिन का लेना चाहिए, जबकि सिम्पल मूविंग औसत 50, 75, 100, 200, 300 व 365 दिनों का कारगर होता है। फिर यह भी ध्यान रखें कि बाज़ार मेंऔरऔर भी

दुनिया भर के शेयर बाज़ारों में महीने में ज्यादा से ज्यादा 20 दिन ट्रेडिंग होती है। शनिवार-रविवार बंद। इसलिए बाज़ार का स्वाभविक चक्र 20 दिन का होता है। महीने के डेरिवेटिव सौदों की मीयाद इन्हीं 20 दिनों की होती है। सारे ट्रेडरों का खरीदना-बेचना इसी हिसाब से चलता है तो 20 दिन का चक्र बन जाता है। इधर अपने यहां ऑप्शन सौदे सप्ताह में सेटल होने लगे हैं तो महीने के भीतर सप्ताह का भी अलग चक्रऔरऔर भी

रिटेल ट्रेडर चाहे नौकरीपेशा हो या काम-धंधा करता हो, उसके पास महीने के शुरू में धन की गरमी रहती है तो ज्यादा रिस्क ले सकता है। लेकिन महीने का अंत आते-आते सारी गरमी निकल जाती है तो उसकी सक्रियता कम हो जाती है। दरअसल, बाज़ार में सक्रिय इंसानों व संस्थाओं का बर्ताव ही उसमें चक्र का स्वभाव पैदा करता है। वरना, शेयर बाज़ार को कोई सजीव वस्तु तो है नहीं, जिसमें अपने-आप चक्र का चक्कर चल निकले।औरऔर भी

त्योहारी सीज़न के साथ हमारे वित्त वर्ष की दूसरी छमाही का आगाज़ होता है। इस दौरान आर्थिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं तो इसका सीधा असर शेयर बाज़ार पर पड़ता है। लेकिन इस सीज़न को परे रखकर देखें तो भी शेयर बाज़ार कुदरत की ऋतुओं की तरह चक्रों में चलता है। आप कहेंगे कि बाज़ार तो छोटे-बड़े हरेक ट्रेडर की खरीद-बिक्री का योगफल होता है। फिर इसमें कहां से मौसम जैसा चक्र आ गया? दरअसल बाजार का हालऔरऔर भी

आज से चालू वित्त वर्ष 2021-22 की दूसरी छमाही शुरू हो रही है। असल में इसमें भी अक्टूबर तिमाही को कंपनियों के साथ ही सरकार व समूची अर्थव्यवस्था के लिए काफी अच्छा माना जाता है। उपभोक्ता उत्पाद बनानेवाली कंपनियों को यकीन रहता कि त्योहारी सीजन होने के नाते इस तिमाही में उनके माल खूब बिकेंगे। सरकार को पूरे साल में जितना उधार जुटाना होता है, रिजर्व बैंक उसके बड़े हिस्से का इंतजाम कर चुका होता है। विदेशीऔरऔर भी

गणपति विसर्जन हो चुका है। श्राद्ध पक्ष की सर्वपितृ अमावस्या अगले हफ्ते बुधवार 6 अक्टूबर को है। इसके बाद भारत के बहुलांश रिटेल व एचएनआई निवेशक त्योहारी सीजन के मूड में आ जाएंगे। यह सिलसिला दशहरा, दीवाली से होते-होते अगले साल पतंग उड़ाने के त्योहार मकर संक्रांति तक चलता रहेगा। बाज़ार में इस दौरान अगले साल मार्च तक होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के कालेधन की भी आवक शुरू हो चुकी होगी। साफ है किऔरऔर भी

हर तरफ हल्ला है कि शेयर बाजार में चल रही तेज़ी रिटेल निवेशकों की सीधी सक्रियता का नतीज़ा है। लेकिन यह दरअसल विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के साथ ही देशी निवेशक संस्थाओं की तरफ से बाज़ार में ज्यादा धन डालने का नतीज़ा है। एफपीआई/एफआईआई ने इस साल अब तक भारतीय शेयर बाज़ार में शुद्ध रूप से 64,655 करोड़ रुपए डाले हैं। म्यूचुअल फंडों ने भी सितंबर तिमाही में अपना एनएवी बढ़ाने के लिए जमकर निवेश किया। वैसे,औरऔर भी

शेयर बाज़ार में जो भी ट्रेडर बाज़ार को प्रभावित करनेवाले कारकों पर नज़र और उनकी समझ रखता है, वह कभी खाली हाथ नहीं लौट सकता। उसे इस सत्य पर कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि ऐसा-ऐसा है तो वैसा-वैसा होगा और ऐसा-ऐसा नहीं है तो वैसा-वैसा नहीं होगा। यह देश-दुनिया, समाज व बाज़ार का अकाट्य नियम है। यह भी ध्यान रहे कि बाज़ार को कोई आसमानी या अदृश्य शक्तियां नहीं चलातीं। जो करते हैं इंसान ही करतेऔरऔर भी