देश में आम निवेशकों के साथ फ्रॉड का सिलसिला जारी है। वित्तीय राजधानी मुंबई वित्तीय फ्रॉड की राजधानी बनती जा रही है। पिछले दिनों महाराष्ट्र की विधान परिषद में खुद राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जानकारी दी कि बीते दस सालों में मुंबई में 2.71 लाख निवेशकों के साथ ₹2.95 लाख करोड़ की धोखाघड़ी हुई है। पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी की रिपोर्ट है कि बीते वित्त वर्ष 2024-25 में इक्विटी डेरिवेटिल सेगमेंट में सक्रिय 96औरऔर भी

हमारे शेयर बाजार में तात्कालिक सुधार की सबसे बड़ी चुनौती है इक्विटी डेरिवेटिव्स के उन्माद को थामकर कैश बाज़ार को ज्यादा गहरा व व्यापक बनाना क्योंकि वही पूंजी-निर्माण और मूल्य-खोज का असली साधन है। डेरिवेटिव्स तो केवल बड़े संस्थागत निवेशकों के लिए रिस्क को संभालने और हेजिंग का ज़रिया भर हैं। वो तो असल में रिटेल ट्रेडरों व निवेशकों के लिए वर्जित क्षेत्र होना चाहिए। यकीनन, भारतीय शेयर बाज़ार का जाल काफी फैल चुका है। देश केऔरऔर भी

लालच जब भीड़ पर सवार हो जाए तो उसे भेड़ बनते देर नहीं लगती। लालच में चली भेड़चाल को रोक पाना सेबी ही नहीं, किसी भी नियामक के लिए मुश्किल है। ऐसे में हम रिटेल या व्यक्तिगत ट्रेडरों को ही आत्म-नियंत्रण का परिचय देना होगा। मोटी-सी बात है कि शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में कमाना या गंवाना शुद्ध रूप से प्रोबैबिलिटी या प्रायिकता का खेल है। साफ दिख रहा है कि डेरिवेटिव ट्रेडिंग में 91% व्यक्तिगत ट्रेडरऔरऔर भी

आखिर शेयर बाज़ार के इक्विटी डेरिवेटिव सेगमेंट (ईडीएस) पर इतनी भारी तादाद में व्यक्तिगत निवेशक पतंगों की तरह जलकर मर जाने के लिए क्यों टूटे पड़े हैं? इसकी सबसे बड़ी वजह है लीवरेज या कम लगाकर काफी ज्यादा पाने की गुंजाइश। निफ्टी ऑप्शंस का न्यूनतम लॉट अब 75 का है। किसी ने 24,950 के स्ट्राइक मूल्य के निफ्टी-50 का पुट ऑप्शंस 26.05 रुपए के भाव से खरीदे तो उसे 75 के लॉट के लिए 1953.75 रुपए देनेऔरऔर भी

पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी बराबर कोशिश कर रही है कि इक्विटी डेरिवेटिव्स को भयंकर सट्टेबाज़ी की गिरफ्त से निकालकर कैश सेगमेंट के रिस्क को संभालने का बेहतर ज़रिया बना दिया जाए। इसके लिए उसने नवंबर 2024 से चल रही पहल के साथ ही 29 मई 2025 से कुछ नए नियम लागू किए हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि इक्विटी डेरिवेटिव सेगमेंट (ईडीएस) में व्यक्तिगत ट्रेडरों के उमड़ने और घाटा खाने के क्रम पर कोईऔरऔर भी

पैसे से पैसा कैसा बनाया जाए – इसकी तलाश दुनिया में हर किसी को रहती है। बिना यह जाने कि पैसे में जो खरीद-फरोख्त की शक्ति आती है, आखिर उसका स्रोत क्या है? भारत में पैसे से पैसा बनाने की यह दीवानगी करीब 1.07 करोड़ लोगों पर सवार है जो शेयर बाज़ार में सक्रिय ट्रेडिंग करते हैं, कैश सेगमेंट से लेकर डेरिवेटिव सेगमेंट तक में। डेरिवेटिव्स में भी ज्यादातर व्यक्तिगत ट्रेडर इंडेक्स ऑप्शंस और स्टॉक ऑप्शंस मेंऔरऔर भी

मध्यवर्ग खर्च चलाने के लिए बैंकों व एनबीएफसी से ऋण लिये जा रहा है। कॉरपोरेट क्षेत्र पूजी निवेश के बजाय कैश बचा रहा है और बैंकों से ऋण लेने से कतरा रहा है। लेकिन देश के उन 81.35 करोड़ गरीबों का क्या जो हर महीने सरकार से मिल रहे पांच किलो मुफ्त राशन पर निर्भर हैं? यह आश्चर्यजनक, किंतु सच है कि भारत के गरीब अमीरों की बनिस्बत ज्यादा धन सोने में लगाकर रखते हैं। सरकार केऔरऔर भी

रिजर्व बैंक का डेटा बताता है कि ‘हम भारत के लोगों’ की वित्तीय आस्तियां वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़कर ₹34.3 लाख करोड़ और देनदारियां ₹18.8 लाख करोड़ यानी, देनदारियां आस्तियों की 54.81% हो गईं। यह 1970-71 के बाद के 53 सालों का सर्वोच्च स्तर है। कोरोना से घिरे वर्ष 2021-22 तक में लोगों की देनदारियां आस्तियों की 34% थीं। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक कोविड के बाद से ही लोगबाग बचा कम और उधारऔरऔर भी

सरकार कह सकती है कि वाह! जनता में कितनी खुशहाली है। लोगों के पास इतनी बचत है कि म्यूचुअल फंड एसआईपी में निवेश जून महीने में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। लगातार 15 महीनों से एसआईपी में आ रहा धन 20,000 करोड़ रुपए से ज्यादा है। लेकिन झाग हटाकर सतह के नीचे देखें तो जनता का संत्रास भी दिख जाता है। जून महीने में 77.8% एसआईपी बीच में ही रोक दिए गए। इस दौरान 48.1 लाख एसआईपीऔरऔर भी

सरकार की तरफ से जारी आंकड़े भारतीय परिवारों की बड़ी ठंडी और बेजान तस्वीर पेश करते हैं। लेकिन उससे परे जाकर देखें तो पता चलता है कि भारतीय परिवार वित्तीय सुरक्षा हासिल करने के लिए जबरदस्त हाथ-पैर मार रहे हैं। वित्तीय आस्तियों में लोगों के पास उपलब्ध कैश, बैंक डिपॉजिट और अन्य वित्तीय निवेश शामिल हैं, जबकि देनदारियों में बैंकों और अन्य स्रोतों से लिये गए ऋण शामिल हैं। वित्तीय आस्तियों से देनदारियां घटा दें तो भारतीयऔरऔर भी