जिन्होंने शेयर बाज़ार में पांच-दस साल के लिए धन लगाया है, उन्हें परेशान होने की ज़रूरत नहीं। लेकिन जो खटाखट मुनाफा बटारने के लिए बाज़ार में कूदे हैं, उन्हें फिलहाल झटपट निकल लेना चाहिए। दरअसल, अपने शेयर बाज़ार का गुब्बारा इतना फूल चुका है कि कभी भी फट सकता है। अर्थव्यवस्था रसातल तो शेयर बाज़ार सातवें आसमान पर! इसमें भी जबरन चढ़ाई गई बर्जर किंग इंडिया, अडानी ग्रीन एनर्जी और रामदेव की 15 कटोरी दाल, 17 गिलासऔरऔर भी

शेयर बाज़ार तेज़ी पर हो तो झूमकर आईपीओ आते हैं। फिलहाल यही स्थिति है। मगर सावधान रहें। हर चमकनेवाली चीज़ सोना नहीं होती। फार्मास्युटिकल केमिकल्स बनानेवाली 32 साल पुरानी एक कंपनी का आईपीओ बीते 21 सितंबर को आया। 340 रुपए पर जारी शेयर पहली अक्टूबर को लिस्ट हुआ तो दोगुने से ज्यादा 744 रुपए तक चला गया। लेकिन फिर गिरने लगा तो बीच-बीच में थोड़ा उठने के बाद रपटता ही जा रहा है। पता चला कि कंपनीऔरऔर भी

भयंकर अनिश्चितता और अवसरों से भरा वित्त वर्ष 2020-21 खत्म हुआ। 1 अप्रैल 2020 को निफ्टी 8253.80 और 26 मार्च 2021 को 14,507.30 पर। साल भर में 75.76% का जबरदस्त रिटर्न। यही है अनिश्चितता के बीच अवसर का कमाल! लेकिन अनिश्चितता बढ़ते ही अफरातफरी और घबराहट फैल जाती है। तब आम लोग नहीं, बल्कि खजाने पर निश्चिंत बैठे शांत लोग ही अवसर देख पाते हैं। वैसे, इस कॉलम में अप्रैल 2020 के चार रविवार को सुझाए शेयरऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के निवेश में पक्का कुछ नहीं होता, केवल प्रायिकता होती है। यहां जो पक्के रिटर्न की बात करते हैं, वे आपको उल्लू बनाते हैं। पक्का तो सरकारी बांड या एफडी पर मिलनेवाला ब्याज होता है। शेयर बाज़ार का कोई भरोसा नहीं कि कहां तक उठेगा या गिरेगा। इसलिए निवेश में ‘पक्का’ और ‘प्रायिकता’ के बीच हमेशा संतुलन बनाकर चलें। 100 रुपए हैं तो पहले 25 बांड या एफडी में और 25 शेयर बाज़ार में। बाकीऔरऔर भी

कुछ ऐसा बताएं कि दस का सौ और फिर सौ का हज़ार हो जाए। क्या शेयर बाज़ार में ऐसा मुमकिन है? यकीनन। अडानी ग्रीन एनर्जी का शेयर 17 मार्च को 112.70 पर था। 24 नवंबर को 1220 तक उठ गया और अब भी 1160 पर है। साल भर में 100 का 1000! लेकिन शेयर बाज़ार का पूरा सच यह है कि चंद चमकते जुगनुओं के पीछे भागनेवाले निवेशक ऐसी गहरी खाई में गिरते हैं कि कभी निकलऔरऔर भी

अच्छी कंपनी। शेयर 1550 के आसपास। इक्विटी सलाहकार फर्म कहती है कि तीन साल में यह 1460 रुपए तक पहुंच जाएगा। मगर इसे तब खरीदना, जब 36.45% गिरकर 985 तक पहुंच जाए। आपको सालाना 14% का चक्रवृद्धि रिटर्न मिल जाएगा। क्या बेवकूफी है! कंपनी अच्छी है तो उसका शेयर तेज़ी के मौजूदा बाज़ार में इतना गिरेगा क्यों? फिर, 1550 के शेयर के तीन साल में 1460 तक पहुंचने की सलाह का क्या तुक? लेकिन इक्विटी रिसर्च कीऔरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार की बागडोर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के हाथों में चली गई है। केयर रेटिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में मध्य-फरवरी तक उन्होंने भारत में 3380 करोड़ डॉलर (करीब 2.49 लाख करोड़ रुपए) डाले हैं। उनका 35.60% निवेश वित्तीय सेवा कंपनियों और इसमें से भी 56.82% निवेश बैंकों में है। पिछले कुछ महीनों में इस क्षेत्र के शेयर सबसे ज्यादा बढ़ते रहे हैं। रिपोर्ट कहती है, एफपीआई तीन महीने में 100 करोड़औरऔर भी

किसी भी देश में उसकी सरकार के बांडों को मूलधन और ब्याज अदायगी के मामले में सबसे सुरक्षित या दूसरे शब्दों में रिस्क-फ्री माना जाता हैं। अभी तक अपने यहां आम निवेशक के लिए इनमें निवेश करना बड़े झंझट का काम था। लेकिन अब रिजर्व बैंक यह झंझट खत्म करने जा रहा है। उसने ‘रिटेल डायरेक्ट’ सेवा शुरू करने की पेशकश की है। इसके अंतर्गत रिटेल निवेशक रिजर्व बैंक में गिल्ट एकाउंट खोलकर सीधे सरकारी बांड खरीदऔरऔर भी

सिद्धांततः कंपनी के शेयरों के भाव उसके शुद्ध लाभ की भावी संभावित वृद्धि पर आधारित होते हैं। यह भी सच है कि आमतौर पर भारतीय निवेशक हर साल 15% ज्यादा शुद्ध लाभ कमानेवाली कंपनियों के शेयर प्रति शेयर मुनाफे (ईपीएस) से 20-22 गुना भाव या पी/ई अनुपात पर खरीदता रहा है। इस समय बाज़ार (निफ्टी) का पी/ई अनुपात 42 तक जा चुका है। शेयर का इतना गुना भाव तभी वाजिब है जब आगामी सालों में कंपनी काऔरऔर भी

अपने यहां आम लोगों में शेयर बाज़ार से जुड़ी इक्विटी या निवेश की नहीं, बल्कि लालच की संस्कृति छाई है। उनकी इसी लालच की टपकती लार का दोहन करने के लिए अधिकांश म्यूचुअल फंडों से लेकर ब्रोकर, निवेश सलाहकर व यूलिप स्कीमें ला रहीं बीमा कंपनियां तक लगी हुई है। लोग टिप्स खोजते हैं, शेयर बाज़ार में लिस्टेड अच्छा बिजनेस करनेवाली कंपनियां नहीं। नहीं समझते कि 60% निवेश लार्जकैप, 30% निवेश मिडकैप, 15% निवेश स्मॉलकैप और 5%औरऔर भी