बिजनेस करना खेती करने जैसा आसान नहीं कि खेत तैयार कर बीज डाल आए, खाद-पानी व कीटनाशक का बराबर इंतजाम किया और मौसम ठीक रहा तो तय समय पर फसल काटकर घर ले आए। बिजनेस में भी व्यापार करना अपेक्षाकृत आसान है जिसमें थोक के भाव माल खरीदकर रिटेल के भाव में बेच मुनाफा कमा लिया जाता है। बिजनेस करने की असली चुनौती है मैन्यूफैक्चरिंग में, जिसमें फैक्टरी लगाकर आप उत्पादन करते हो। कच्चा माल हासिल करनेऔरऔर भी

सामान्य निवेशक के लिए शेयर बाज़ार में कोई सुरक्षित कोना पकड़ पाना बेहद कठिन है। हर तरफ इतना शोर, भ्रम, भारी-भरकम शब्दजाल और लूट-खसोट है कि वह घबरा कर छिटक जाता है। ट्रेडिंग की बात करें तो कहा जाता है कि 90% ट्रेडर इसमें घाटा खाते हैं। जो 10% घाटा नहीं खाते, वे इतना भी नहीं कमा पाते कि अपने परिवार के लिए औसत ज़िंदगी सुनिश्चित कर सकें। सालों-साल से यही सिलसिला चला आ रहा है। फिरऔरऔर भी

देश-दुनिया में बुरी खबरें आती ही रहती हैं। लेकिन भारत जैसे विकासशील देश की अर्थव्यवस्था अपनी संपूर्ण संभावना को हासिल करने की दिशा में बढ़ती रहती है। इसलिए यहां का शेयर बाज़ार भी बराबर बढ़ता रहता है। आज आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 12 साल पहले अप्रैल 2011 में एनएसई निफ्टी 5550 और बीएसई सेंसेक्स 18,500 अंक के आसपास था। इन 12 सालों में तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद दोनों सूचकांक तीन गुना से ज्यादा बढ़ चुके हैं।औरऔर भी

शेयर बाज़ार चार महीने से कदमताल ही किए जा रहा है। आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रहा। बहुत सारे निवेशकों व ट्रेडरों को लगता था कि उथल-पुथल भरे साल 2022 के बाद 2023 उठाव का साल होगा। लेकिन न तो अभी तक ऐसा हुआ है और न आगे ऐसा होने के कोई आसार दिख रहे हैं। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका अगले छह महीनों में मंदी की शिकार हो सकती है। विश्व अर्थव्यवस्था पर अनिश्चितताऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की चाल कभी इतनी सीधी-सच्ची नहीं होती कि उस पर आंख मूंदकर सवारी की जा सके। अजीब-सा पेंच है कि अक्सर अच्छे नतीजे घोषित करनेवाली कंपनियों के शेयर गिर जाते हैं, जबकि खराब नतीजे पेश करनेवाली कंपनियों के शेयर चढ़ जाते हैं। दिक्कत यह है कि हम भूल जाते हैं कि शेयरों के भाव और मूल्य, दो अलग-अलग चीजें हैं। लम्बे समय में भाव कंपनी के शेयर के मूल्य या अंतर्निहित मूल्य का पीछा करतेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार हो या वित्तीय बाज़ार का कोई भी निवेश, वो किसी निर्वात में नहीं होता। हर निवेश का एक संदर्भ और माहौल होता है। इधर साल भर पहले मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए अमेरिका से ब्याज दरें बढ़ाने का सिलसिला जब से शुरू हुआ, तब से सारी दुनिया के वित्तीय समीकरण बदल गए हैं। अमेरिका में तो ब्याज दरों के शून्य से 5% पहुंचने का ही नतीजा है कि बैंकों के सारे बॉन्ड पोर्टफोलियो कीऔरऔर भी

किसी भी कंपनी में निवेश करने से पहले उसकी परख और कामकाज का विश्लेषण ज़रूरी है। दिक्कत यह है कि यह ज़रूरी काम कायदे से कैसे किया जाए? कंपनी के अतीत का विश्लेषण हम कर सकते हैं। उसके अब तक के वित्तीय प्रदर्शन की तहकीकात कर सकते हैं। उद्योग व बाज़ार की तुलना में उसके शेयर का मूल्यांकन कर सकते हैं। ये पहलू मात्रात्मक विश्लेषण से साफ हो जाते हैं। इनमें कंपनी पर चढ़े ऋण से जुड़ाऔरऔर भी

पूरे पांच हफ्ते के अंतराल के बाद थोड़ा-सा स्वस्थ होते ही यह कॉलम लेकर एक बार फिर आपकी सेवा में हाज़िर हूं। कोशिश करता हूं कि हर हफ्ते निवेश लायक एक नई लिस्टेड कंपनी पेश कर दूं। लेकिन शेयर बाज़ार में तो ढाई हज़ार से ज्यादा कंपनियां लिस्टेड हैं। आप हमारी बताई हर कंपनी में निवेश करने लगें तो चकरघिन्नी बन जाएंगे। दरअसल, हमें समझना होगा कि बाज़ार में भांति-भांति के लोग निवेशकों को फंसाने के लिएऔरऔर भी

हमें शेयर बाज़ार में निवेश करने से पहले भलीभांति समझ लेना चाहिए कि कंपनियां निवेशकों के स्वामित्व वाली सामाजिक इकाई हैं जिनका मकसद है अपने निवेशकों द्वारा लगाई गई पूंजी पर रिटर्न को अधिक से अधिक करते जाना। रिटर्न का यूं बढ़ना कंपनियों के शेयर के भावों में झलकता है, भले ही वे कंपनियां लिस्टेड हों या न हों। हां, लिस्टेड कंपनियों में सहूलियत यह होती है कि उनके शेयर के भाव हर दिन स्टॉक एक्सचेंज मेंऔरऔर भी

कंपनी का अतीत देखा-परखा जा सकता है। तमाम टूल्स व फॉर्मूले भी हैं जिनसे उसका भविष्य आंका जा सकता है। यह काम कोई दूसरा आपके लिए कर सकता है। लेकिन तीन पहलू ऐसे हैं जिन्हें निवेश करने से पहले खुद आपको समझना पड़ता है। पहला यह कि कंपनी का बिजनेस मॉडल क्या है और उसमें विकास की कितनी गुंजाइश है? दूसरा यह कि उसका प्रबंधन कैसा है? प्रबंधन का काबिल होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि यह भीऔरऔर भी