हमारे शेयर बाज़ार में म्यूचुअल फंडों में एसआईपी के नियमित प्रवाह से देशी वित्तीय संस्थाओ का दम भले ही बढ़ गया हो, लेकिन इसकी दशा-दिशा तय करने में अब भी विदेशी पूंजी का अहम रोल है। इस विदेशी पूंजी का प्रोफाइल साल 2017 में भारत-मॉरीशस टैक्स संधि में संशोधन और सेबी के कड़े नियमों के बाद काफी बदल गया है। 2015 तक भारत में आ रहे विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) में मॉरीशस के पते वाली फर्मों काऔरऔर भी

आज के हालात में भारत में कमाना बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए भी मुश्किल हो गया है। दिसंबर तिमाही के ताज़ा वित्तीय नतीजे पस्ती की हालत का दस्तावेज़ बन गए हैं। जिन आईटी कंपनियों का दायरा विदेश तक फैला हुआ है, उन तक के नतीजे उम्मीद से खराब रहे हैं। इनमें टीसीएस, इन्फोसिस, एचसीएल टेक, विप्रो, टेक महिंद्रा और एलटीआई माइंडट्री शामिल हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और आईसीआईसीआई बैंक तक ने निराश किया है। रिलायंस रिटेल का धंधा दबनेऔरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार का मूल्यांकन बहुत चढ़ा हुआ है। दुनिया में अमेरिका को छोड़ दें तो चीन व हांगकांग से लेकर यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया व ब्राज़ील तक के बाज़ार पी/ई अनुपात के पैमाने पर भारत से बहुत सस्ते हैं। क्या यह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के भारत से पलायन की प्रमुख वजह नहीं है? क्या आपको नहीं लगता कि भारतीय शेयर और वहां ट्रेड हो रही तमाम अच्छी कंपनियों के शेयरों का मूल्यांकन बहुत ज्यादा है? यहऔरऔर भी

बीएसई सेंसेक्स इस समय 23.06 और एनएसई निफ्टी सूचकांक 22.36 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। यह दुनिया में केवल अमेरिका के शेयर बाज़ार से सस्ता है, जबकि चीन, जापान, कोरिया, हांगकांग, ब्राज़ील, जर्मनी, फ्रांस, कनाडा व ऑस्ट्रेलिया तक से महंगा है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक शायद इसी वजह से भारत से भागे जा रहे हैं। लेकिन इसके मूल में छिपी एक अन्य वजह है भारतीय अर्थव्यवस्था में खपत या उपभोग की दयनीय स्थिति। इसके दोऔरऔर भी

जीवन ही नहीं, निवेश में भी हर साल कोई न कोई सबक देकर जाता है, बशर्ते हम सीखने को तैयार हों। साल 2025 का खास सबक यह है कि माहौल में जब हर तरफ उहापोह व दुविधा छाई हो, तब तिनके बचाते नहीं, सबसे पहले डूब जाते हैं। माना जाता है कि स्मॉल-कैप कंपनियों सबसे ज्यादा रिटर्न देती हैं। लेकिन बीते साल ने यह मिथक धराशाई कर दिया। 1 जनवरी से 31 दिसंबर 2025 के बीच निफ्टी-50औरऔर भी

किसी ज़माने में शेयर बाज़ार में लोग भावों को भगवान मानते थे। आज भी कुछ लोग मानते हैं। लेकिन भाव के ‘भगवान’ के साथ बाज़ार में कैसा खेल होता है, इसे देखकर आप दंग रह जाएंगे। आरआरपी सेमिकंडक्टर्स केवल बीएसई में लिस्टेड है। अप्रैल 2024 में इसके शेयर का भाव ₹20 की रेंज में चल रहा था। वहां से बढ़ते-बढ़ते 10 नवंबर 2025 को ₹11,902 तक चला गया। करीब डेढ़ साल में 59,410% का रिटर्न। वो भीऔरऔर भी

खुद अपने दम पर उद्यमी बने देश के 200 शीर्ष लोगों की मिलेनिया-2025 की सूची में ज़ोमैटो प्लेटफॉर्म चला रही कंपनी इटरनल के सीईओ दीपिंदर गोयल भले ही पहले नंबर पर हों, लेकिन दूसरे नंबर पर रहे राधाकृष्ण दामाणी ऐसी शक्सियत हैं जो शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से लेकर निवेश व उद्यमिता की शानदार मिसाल हैं। उनके निवेश पोर्टफोलियो का मूल्य दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है। 71 साल के हो चुके दामाणी ने स्टॉक-ब्रोकर रहेऔरऔर भी

साल 2025 का आखिरी महीना। इसी महीने के पहले दिन बीएसई सेंसेक्स 86,159.02 और एनएनई निफ्टी 26,325.80 के नए ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गया। उसके बाद से मुनाफावसूली जारी है। फिर भी इस वक्त सेंसेक्स 23.26 और निफ्टी 22.68 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। पी/ई अनुपात ही मूलतः वो पैमाना है जिससे पता चलता है कि कोई स्टॉक या सूचकांक, मतलब बाज़ार महंगा है या नहीं। निफ्टी का पी/ई अनुपात 20 से नीचे रहताऔरऔर भी

देश के 80% परिवार इतना भी कमा नहीं पाते कि कहीं निवेश कर सकें। बाकी 20% में भी बहुतेरे ऐसे हैं जो जमकर कमाने के बाद भी कुछ बचा नहीं पाते। इनके लिए धन हाथ की मैल नहीं, बल्कि पानी की तरह है जो कोई न कोई जरिया खोजकर बहता रहता है। धन लोगों की आदतों, बर्ताव, भावनाओं, चाहतों, विश्वास, लालच, सुरक्षा व स्वभाव के अनुरूप कहीं टिकता तो कहीं फिसलता रहता है। दुनिया में मूल्यवान निवेशऔरऔर भी

लोग अक्सर पूछते रहते हैं कि शेयर बाज़ार कहां जाएगा। इनमें नाते-रिश्तेदार से लेकर निवेश व ट्रेडिंग से जुड़े तमाम लोग शामिल हैं। बाज़ार की अनिश्चितता के बीच निश्चितता खोजना सहज मानवीय वृत्ति या कमजोरी है। हर छोटा-बड़ा धंधेबाज़ इसका फायदा उठाता है। ऋधम देसाई बहुत बड़े मार्केट गुरु हैं। कई किताबें लिख चुके हैं। अखबारों में कॉलम लिखते हैं। भारत में मॉरगन स्टैनले जैसे बहुराष्ट्रीय निवेश बैंक के मुख्य इक्विटी रणनीतिकार हैं। उन्होंने हाल ही मेंऔरऔर भी