दायरे की जरूरत
दुनिया में ऐसा कुछ नहीं जो किसी न किसी को पता न हो या उसे जानने की कोशिश न चल रही हो। सबको सब पता रहे, जरूरी नहीं। लेकिन ज़िंदगी का दायरा जितना बड़ा हो, उतना तो जानना जरूरी है।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
दुनिया में ऐसा कुछ नहीं जो किसी न किसी को पता न हो या उसे जानने की कोशिश न चल रही हो। सबको सब पता रहे, जरूरी नहीं। लेकिन ज़िंदगी का दायरा जितना बड़ा हो, उतना तो जानना जरूरी है।और भीऔर भी
तीन तरह के लोग होते हैं। एक, जिनके लिए कोई समस्या नहीं होती। दो, जो मानते हैं कि समस्या तो है, पर समाधान नहीं। तीन, जो मानते हैं कि समस्या है और इसे हल भी किया जा सकता है।और भीऔर भी
समस्याओं का होना कोई बुरी बात नहीं, अगर हम उनसे जूझने को तैयार हों। देखें कि कौन-सी समस्या व्यक्तिगत है और कौन-सी व्यवस्था-जन्य क्योंकि इनसे निपटने के तरीके भिन्न होते हैं।और भीऔर भी
काल की धारा में बहना आसान है, तैरना कठिन है। बहने के लिए कुछ नहीं करना होता। लेकिन तैरने के लिए सीखना पड़ता है, धारा को समझना पड़ता है, प्रवाह से लड़ना पड़ता है। इंसान बनना पड़ता है।और भीऔर भी
शब्दों के बिना विचारों की कनात नहीं तनती। रिश्तों की डोर न हों तो भावनाएं नहीं निखरतीं। औरों की नज़र न हो तो अपनी गलती का एहसास नहीं होता। विराट न हो तो शून्य सालता है, सजता नहीं।और भीऔर भी
तुम कुछ भी कहो, मैं तो ठसक से यही बोलूंगा कि मैं जो भी करता हूं वह सही होता है। यह मेरा विश्वास है और विश्वास के किया गया काम गलत नहीं होता। गलत हुआ भी तो मैं ही इसे सुधारूंगा, तुम नहीं।और भीऔर भी
हम बाहरी संसार से वास्ता जितना बढ़ाते हैं, हमारा भाव संसार उतना ही बढ़ता जाता है। खुशियों और अनुभूतियों के नए सूत्र मिलते हैं। इसलिए हर नई जानकारी को लपक कर पकड़ लेना चाहिए।और भीऔर भी
कभी-कभी किसी के साथ रहना सज़ा से कम नहीं होता। सज़ा आजीवन कारावास की हो तो और सांसत! गुनाह किया हो तो सज़ा कुबूल है। लेकिन बगैर गुनाह के सज़ा मिलना तो सरासर नाइंसाफी है भाई।और भीऔर भी
किसी समस्या का विकराल या मामूली लगना इससे तय होता है कि हम सो रहे हैं या जग रहे हैं। सोते वक्त जरा-सी समस्या भी भयावह लगती है। इसलिए पहले नींद से निकलें, फिर समस्या से लड़ाएं पंजा।और भीऔर भी
प्रकृति ने हर इंसान को मौलिक बनाया है। एक ही मां-बाप की संतानों में जीन्स का भिन्न समुच्चय। फिर भी अनुकृतियों से भरा समाज! दोष किसका? थोड़ा हमारा तो बहुत सारा जीने की शर्तों का।और भीऔर भी
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