जमना-टूटना
समाज बार-बार जमकर जड़ होती और टूटकर फिर से बनती सत्ता का नाम है। यथास्थिति बनी रही तो कुशल है। अन्यथा बवाल मच जाता है। नया कुछ करनेवालों को समाज का बहुमत नकारता है। लेकिन अल्पमत को लेकर वही लोग नया समाज बनाते हैं।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
समाज बार-बार जमकर जड़ होती और टूटकर फिर से बनती सत्ता का नाम है। यथास्थिति बनी रही तो कुशल है। अन्यथा बवाल मच जाता है। नया कुछ करनेवालों को समाज का बहुमत नकारता है। लेकिन अल्पमत को लेकर वही लोग नया समाज बनाते हैं।और भीऔर भी
हम ज्यादातर अपनी निष्क्रियता और दूसरे के कर्मों का फल भोगते हैं। जिस दिन से हम सोच-समझकर कायदे से अपने कर्मों पर उतर आते हैं, उसी दिन से सफलता की हमारी यात्रा शुरू हो जाती है। ऊंच-नीच जरूर आती है, लेकिन मंजिल मिलकर रहती है।और भीऔर भी
इंसानों की बनाई इस दुनिया में कुछ भी पूर्ण नहीं। अपनी समझ से सब कुछ सही करते हुए भी हम गलत मोड़ पर पहुंच सकते हैं। तरीका सही, जवाब एकदम गलत। लेकिन इस तरह हम अपनी सोचने की प्रक्रिया को माजते हुए जरूर पूर्ण बना सकते हैं।और भीऔर भी
कल क्या हुआ, यह हम सभी जानते हैं। लेकिन कल क्या होगा, यह कोई नहीं जानता। कल अच्छा भी हो सकता है, सामान्य भी और बुरा भी। एक अकेले व्यक्ति का इस पर कोई वश नहीं। हां, सामूहिक रूप से जरूर इसे कुछ हद तक बांधा जा सकता है।और भीऔर भी
सागर की अतल गहराई नापी जा सकती है। लेकिन सतह पर बैठे हुए खुलती परतों की गहराई नापना बेहद मुश्किल है क्योंकि हर परत एक नई दुनिया खोल देती है, पुरानी ही दुनिया को नए मायने दे देती है और आप अनंत गहराइयों में उतरते चले जाते हैं।और भीऔर भी
अगर आप अपने से खुश हैं तो दुनिया भी आपकी परवाह करेगी। लेकिन अगर आप खुद अपने से ही दुखी हैं तो भगवान भी आपको नहीं बचा सकता। इसलिए अपनी कमियों व खूबियों का सही अहसास जरूरी है। न तो आत्ममुग्धता और न ही आत्मदया।और भीऔर भी
कभी फुरसत में कुछ भी नहीं होने की कल्पना कीजिए। एकदम सन्नाटा, कोई ख्याल नहीं। है न बड़ा मुश्किल! लेकिन यह शून्य बेहद अहम है। यह शून्य ही वो आखिरी अंक है जिसकी खोज हमने की। यह न होता तो आज दुनिया ज्ञान-विज्ञान में शून्य होती।और भीऔर भी
हमारी मान्यताएं एक तरफ। व्यावहारिक व व्यावसायिक सोच एक तरफ। दोनों अलग-अलग खानों में बंटी हुई। मगर जीवन तो मूलतः एक ही खंड है, समरूप है। ऐसे में होता यह है कि मान्यता और सोच की खींचतान में जीवन ही विखंडित हो जाता है।और भीऔर भी
कितना अजीब है! संगठन या संस्था में लोगों को लालच देकर रोकना मुश्किल है। पर उनके सामने चुनौतियां पेश कर दो तो वे बड़ी आसानी से रुक जाते हैं। उनके निजी विकास की संभावनाओं के द्वार खोल दो, वे कहीं और जाने का नाम ही नहीं लेंगे।और भीऔर भी
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