हांकते-हांकते कहां से कहां आ गए हम!
देश के सीने पर बारह साल से चढ़कर बैठी मोदी सरकार में हांकने वालों की कोई कमी नहीं। वैसे, लम्बी फेंकने व हांकने में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई सानी नहीं। लेकिन उनको किनारे रख दें, तब भी इनके मंत्री परिषद में एक से एक नमूने भरे पड़े हैं। वाणिज्य व उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ऐसे ही एक नगीना हैं। उनका दावा है कि यूरोपीय संघ के साथ की गई व्यापार संधि व्यापार ही नहीं, भारतऔरऔर भी
कंपनियां बढ़तीं देश की नीतियों के साथ!
कंपनियां किसी निर्वात में नहीं काम करतीं। वे जिस उद्योग में काम करती हैं, उसके उतार-चढ़ाव व हालात से प्रभावित होती हैं। जिस देश में काम करती हैं, उसकी नीतियों से प्रभावित होती हैं। घरेलू नीतियों से देश का भीतरी बाज़ार प्रभावित होता है तो व्यापार संधियों से कंपनियों को विदेशी बाज़ार पाने में सहूलियत हो जाती है। भारत ने हाल में यूरोपीय संघ और अमेरिका के अलावा ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसेऔरऔर भी
कृषि रिसर्च पर खर्च क्यों घटा दिया ताई!
ऐसा नहीं है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एकदम बौडम और महामूर्ख हैं। ऐसा भी नहीं कि देश-विदेश में विशेषज्ञों की कोई कमी है। लेकिन असली समस्या यह है कि सरकार की नीयत में भयंकर खोट है। बजट में कहा गया है कि किसानों की आमदनी बढ़ाने का लक्ष्य उत्पादकता और उद्यमशीलता बढ़ाकर हासिल किया जाएगा। लघु व सीमांत (2.5 एकड़ से पांच एकड़ जोत वाले) किसानों पर खास ध्यान दिया जाएगा। सरकार ने इसके लिए भारत-विस्तारऔरऔर भी
बजट में दी अमेरिकी हितों को तरजीह
हम एक ऐसे दौर में रह रहे हैं, जब हर देशवासी को हमारे राष्ट्रीय हितों को ठीक से जानना व समझना ज़रूरी है। नहीं तो केंद्र की सत्ता में बैठी सरकार कभी भी राष्ट्रीय हितों का नाम लेकर देश को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। बजट में बड़ी मासूमियत से कहा गया कि डेटा केंद्रों में निवेश बढ़ाने और ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत को देखते हुए भारत में डेटा सेंटर की सेवाओं को इस्तेमाल करते हुए दुनियाऔरऔर भी






