भारत के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि जो ऊपर-ऊपर दिख रहा है, वो असल में वैसा है या नहीं, इसका कोई भरोसा या ठिकाना नहीं। सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था, जीडीपी में दुनिया की पांचवीं से चौथी और चंद सालों में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने के शोर और धमाकेदार सुर्खियों के झाग के नीचे कोई देखने की जहमत नहीं उठाता कि हमारी टैक्स प्रणाली, सरकारी दखल और न्यायिक से लेकर इन्सॉल्वेंसी जैसीऔरऔर भी

अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि उसकी मुद्रा डॉलर आज भी दुनिया भर की रिजर्व करेंसी बनी हुई है। वहां के वित्तीय बाज़ारों में कुछ हो जाए तो सारी दुनिया हिल जाती है। अमेरिका के ट्रेजरी बॉन्डों पर यील्ड की दर पर दुनिया भर की ब्याज दरें टिकी हुई हैं। जब ऐसे अमेरिका की संप्रभु रेटिंग या साख पर सवाल उठ जाएं तो भारत समेत दुनिया के हर देश को चौकन्ना हो जाने कीऔरऔर भी

इस बार मूडीज़ द्वारा अमेरिका की संप्रभु रेटिंग का गिराया जाना कोई सामान्य बात नहीं है। साल 2011 में स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने रेटिंग तब घटाई, जब अमेरिका ने निर्धारित ऋण की सीमा बुरी तरह तोड़ दी थी। 2023 में फिच ने रेटिंग घटाई, जब कोविड महामारी के चलते अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल मची हुई थी। लेकिन मूडीज़ ने में रेटिंग तब घटाई है, जब अमेरिका में एक साल से अपेक्षाकृत शांति चल रही है। मुद्रास्फीति व बेरोज़गारीऔरऔर भी

मोदी सरकार अब भी शेखी बघारने से बाज नहीं आ रही, जबकि उसके विदेशी निवेश आधारित विकास मॉडल के पैरों तले ज़मीन खिसक चुकी है। रिजर्व बैंक के मुताबिक भारत वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान नए प्रोजेक्ट में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को लेकर अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस के बाद चौथा पसंदीदा देश रहा है। वित्त मंत्रालय इसका ढोल जमकर बजा रहा है। लेकिन जैसे ही हम सकल निवेश के बजाय शुद्ध निवेश पर आते हैं तोऔरऔर भी