जब दुनिया एप्सटीन फाइलों के खुलासों से निकलकर अमेरिका व इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध के चलते समूचे मध्य-पूर्व मे फैली अशांति में उलझी हुई थी और हम देश में कच्चे तेल व गैस की आपूर्ति का हिसाब लगा रहे थे, उसके ठीक पहले सरकार ने अर्थव्यवस्था या जीडीपी के साथ बड़ा खेला कर दिया। उसने राष्ट्रीय खातों के डेटा की नई सीरीज़ जारी कर दी, जिसमें जीडीपी और जीवीए की गणना का आधार वर्षऔरऔर भी

आम जीवन की तरह निवेश की दुनिया में भी धारणाए व मान्यताएं हकीकत से टकराकर बराबर टूटती रहती हैं। इसलिए धारणाओं और मान्यताओं से चिपके रहना गलत है। 28 फरवरी को अमेरिका-इज़राइल ने ईरान पर हमला किया तो शुरू में जानी-समझी प्रतिक्रिया हुई। शेयर बाज़ार गिर गए, मुद्राएं कमज़ोर पड़ गई और जिंसों के दाम बढ़ गए। सोने के दाम खटाक से 2.15% और चांदी के दाम 1.63% बढ़ गए। कहा जाने लगा कि देश में सोनाऔरऔर भी

भारत दुनिया में अमेरिका व चीन के बाद कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। हम अपनी मांग का 88% कच्चा तेल आयात करते हैं। एलपीजी और एलएनजी की जरूरत का भी 80-85% आयात करते हैं। कच्चे तेल और गैस का बड़ा हिस्सा हम पश्चिम एशिया या मध्य-पूर्व के देशों से लाते हैं। अमेरिका-इज़राइल और ईरान के युद्ध से यह पूरा आयात खतरे में पड़ गया है, खासकर ईरान द्वारा होर्मुज़ स्ट्रैट को बंद करऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के तमाम मंत्री-संत्री अमेरिका व इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध पर कुछ भी साफ नहीं बोल रहे। उनके चंगू-मंगू और भड़वा-टाइप पत्रकार ज़रूर चिल्ला रहे हैं कि सरकार की विदेश नीति देशहित को केंद्र में रहकर चलती है और ईरान का साथ न देना भारत के राष्ट्रीय हित में है। कोई उनसे पूछे कि जो हमला समूची दुनिया के हित में नहीं है, वो भारत के हित में कैसेऔरऔर भी

डोनाल्ड ट्रम्प ललकार रहे हैं कि ईरान के खिलाफ युद्ध चार-पांच हफ्ते चलेगा। वहीं, ईराने अपने वजूद के लिए लड़ रहा है तो वह तब तक लड़ेगा, जब तक अमेरिका पीछे नहीं हट जाता। साथ ही इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू का सफाया उसका लक्ष्य है। ईरान बार-बार कह चुका है कि उसने तो डिप्लोमैसी का राह चुनी थी और युद्ध उस पर थोपा गया है। तथ्यों से भी यही सच निकलता है। जून 2025 में भीऔरऔर भी