आज़ादी के 78 साल बाद भारत की यह कैसी हालत और दुर्भाग्य है कि अमेरिका का सनकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प तय रहा है कि हम पेट्रोलियम तेल और हथियार रूस से नहीं, उससे खरीदें। नहीं तो वो हमारे निर्यात पर दुनिया का सबसे ज्यादा 50% टैरिफ लगा देगा। वो भी तब, जब हमारे पास इतनी अपार प्राकृतिक और मानव सम्पदा है। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी हमारे पास, दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार हमारे पास। फिर भी हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते तो हैं कि वो देश के किसानों, पशुपालकों व मछुआरों के हितों के लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत बड़ी कीमत चुकाने को तैयार हैं। लेकिन उनमें हिम्मत नहीं कि ट्रम्प का नाम लेकर उसे ललकार सकें। उसकी भरपाई में कांग्रेस के 83 साल के वयोवृद्ध अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को कहना पड़ता है, “भारत का राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है। जो देश हमारी रणनीतिक स्वायत्तता की समय-सिद्ध नीति के लिए भारत को मनमाने ढंग से दंडित करता है, वो नहीं समझता कि भारत किस फौलादी ढांचे से बना है।” अंग्रेजी के द हिंदू अखबार तक को संपादकीय लिखना पड़ा, “भारत की संप्रभुता से कोई समझौता नहीं हो सकता और इसकी विदेश नीति अन्य देश नहीं तय कर सकते, भले ही भारत के साथ उनके संबंध कितने भी अहम क्यों न हों।” अब सोमवार का व्योम…
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