देश के आम से लेकर खास लोग और दिहाड़ी मजदूर से लेकर कॉरपोरट तक हम सभी रोजमर्रा के जीवन में जो देखते, समझते, झेलते, भोगते व महसूस करते हैं, वो नॉमिनल जीडीपी और उसकी विकास दर में ही झलकता है। हालांकि दुनिया भर में इसे मुद्रास्फीति-निरपेक्ष बनाने के लिए डिफ्लेटर का इस्तेमाल कर रीयल जीडीपी और उसकी विकास दर निकाली जाती है। लेकिन एक बात हमेशा ध्यान में रखें कि रीयल जीडीपी और उसकी विकास दर मूलतः डेरिवेटिव है, जो असल में होती नहीं, अलग से गिनकर निकाली जाती है। इसलिए इसमें सरकारों का मनमानी की पूरी गुंजाइश है। मसलन, अपने यहां डिफ्लेटर को सच्चाई छिपाकर रीयल जीडीपी को चमकाने और देश-दुनिया को झांसा देने का हथियार बना लिया गया है। अमूमन डिफ्लेटर को रिटेल मुद्रास्फीति या उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति माना जाना चाहिए। लेकिन मोदी सरकार ने बड़ी चालाकी से थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित थोक मुद्रास्फीति को डिफ्लेटर बना दिया, क्योंकि उसकी दर 2014 से 2025 तक रिटेल मुद्रास्फीति से औसतन 2.2% कम रही थी। अब थोक मुद्रास्फीति ज्यादा चल रही है तो नया डिफ्लेचर ले आई। मोदी सरकार के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मणियन ने एक शोधपत्र में लिखा है कि भारत के जीडीपी की रीयल विकास दर 4-4.5% रही है, जबकि सरकार 6-7% से ज्यादा का दावा करती रही है। अब मंगलवार की दृष्टि…
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