देश में इस वक्त 12.1 करोड़ युवा ऐसे हैं जो न तो पढ़ रहे हैं और न ही किसी रोज़गार या ट्रेनिंग में लगे हैं। 2012 से 2024 तक युवा बेरोजगारों की संख्या तीन गुनी हो गई। जो आज तक दुनिया की किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था में नहीं हुआ, वो भारत में हो चुका है। यहां 2020 से 2024 के बीच उद्योग-धधों से निकलकर आठ करोड़ मजदूर वापस खेती-किसानी में लौट गए। भारत की यह दारुण हकीकत जाने-माने अर्थशास्त्री सतोष मेहरोत्रा ने अपनी नई किताब ‘इंडिया आउट ऑफ वर्क, रीथिंकिंग इंडियाज़ ग्रोथ स्टोरी’ में बयां की है। इसे उन्होंने हैदराबाद विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर जजाति परिदा के साथ मिलकर लिखी है। न पढ़ाई, न रोज़गार और न ही ट्रेनिंग लगे युवक-युवतियों के लिए उन्होंने एक नया नाम नीट (NEET) निकाला है जिनकी संख्या इस समय 12 करोड़ को पार कर चुकी है। सोचए कि यह देश की कितनी बड़ी मानव संपदा की बरबादी है! संतोष मेहरोत्रा कहते हैं कि सरकारी अर्थशास्त्री चार साल में जिस आठ करोड़ रोज़गार के बढ़ने का दावा करते हैं, वो असल में उद्योग-धंधों या सेवा क्षेत्र में नहीं, बल्कि कृषि क्षेत्र में मजबूरी में खपने का आंकड़ा है। यह भी कमाल की बात हैं कि गांवों में सर्वे में पूछे जाने पर जिन महिलाओं ने कहा कि वे घर का काम करती है, उन्हें भी बिना भुगतान वाली रोज़गार-याफ्ता आबादी में गिन लिया गया। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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