मैन्यूफैक्चरिंग की पस्ती, आर्थिक आपदा

इसे देश की आर्थिक आपदा कहें या अर्थव्यवस्था में बढ़ रहा असंतुलन। इसका मूल आधार है मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का ठहराव और जीडीपी में उसके योगदान का घटते जाना। विश्व बैंक के डेटा के मुताबिक 2015 में हमारे जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 16% हुआ करता था। यह 2025 तक घटकर 13% रह गया है। इसी दौरान इंडोनेशिया के जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा बढ़कर 19%, मलयेशिया में 23% और वियतनाम में 24% हो गया। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में ही जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का योगदान 2025 तक 25% पर पहुंचा देने का दम भरा था। लेकिन उनकी सरकार की नीतियो और कर्मों से मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र एकदम मरा पड़ा है। सोचिए, 2021-22 से 2025-26 तक के चार साल में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र से निकला देश का माल निर्यात 422 अरब डॉलर से मात्र 4.7% बढ़कर 441.78 अरब डॉलर पर पहुंच सका। इसी दौरान देश में हुआ आयात 26.8% बढ़ गया। नतीजतन, देश का व्यापार घाटा 191 अरब डॉलर से बढ़ते-बढ़ते 333 अरब डॉलर हो गया। इसमें से कच्चे तेल के अपरिहार्य आयात को निकाल दें, तब भी घाटा 213 अरब डॉलर रहता है। इसका आधे से ज्यादा 52.66% घाटा (112.16 अरब डॉलर) चीन से ज्यादा माल आयात करने के कारण हुआ है। फिर भी मोदी सरकार बराबर चीन पर क्यों मेहरबान है? अब मंगलवार की दृष्टि…

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