रुपए का गिरना, रोज़गार का घटना, भ्रष्टाचार का बढ़ना, अमीरों का और ज्यादा अमीर और गरीबों का और ज्यादा गरीब होते जाना। यह सारा कुछ हमारी अर्थव्यवस्था में पनपते भयंकर असंतुलन के लक्षण हैं। फिर भी अर्थव्यवस्था की बीमारी अभी असाध्य नहीं हुई है। इस बीमारी के स्वरूप को ऊपरी तौर पर तीन विकासक्रमों से समझा जा सकता है। एक, महंगे फोन और कंप्यूटर बेचनेवाली कंपनी एप्पल इंडिया की आय रोजमर्रा के आम उपभोक्ता सामान बेचनेवाली देश की सबसे बड़ी कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर से ज्यादा हो गई है। दो, देश भर में ऐप्प आधारित टैक्सी सेवा चला रही उबर के साथ जुड़े सक्रिय ड्राइवरों की संख्या 14 लाख हो चुकी है, जो भारतीय रेल के कुल 12.5 लाख नियमित कर्मचारियों से ज्यादा है। इस समय देश में उच्च-कौशल वाली आईटी व वित्तीय सेवाओं और मध्यम-कौशल वाले मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में नौकरियों का टोंटा है। लेकिन कम-कौशल वाली डिलीवरी राइडर जैसी सेवाओं में जमकर काम बढ़ रहा है। दो साल में जेप्टो के राइडर 49,278 से बढ़कर 2.21 लाख, ज़ोमैटो व ब्लिन्किट के पांच से दस लाख और स्विगी के राइडर 6.1 लाख हो चुके हैं। तीन, केवल फाइनेंस, बीमा व रिटेल क्षेत्र की बहार है। एनएसई और रिलायंस जियो के आईपीओ आनेवाले हैं। पिछले कुछ सालों में आए दस बड़े आईपीओ में से एलआईसी, पेटीएम, टाटा कैपिटल, ज़ोमैटो और विशाल मेगामार्ट जैसे सात आईपीओ फाइनेंस, रिटेल या ऐसी ही कुछ अन्य सेवाओं से संबंधित थे। अब सोमवार का व्योम…
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