पश्चिम एशिया के संकट से उपजी अनिश्चितता काफी हद तक खत्म हो चुकी है। प्रति बैरल कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर के पार जाने के बाद 70 डॉलर के आसपास डोल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दावा कर रहे हैं कि उन्होंने सदी के सबसे बड़े संकट को रणनीतिक फैसलों और राजनय से निपटा दिया। लेकिन क्या भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सब कुछ सामान्य हो गया है? क्या हमारा शेयर बाज़ार उसी तरह बम-बम करेगा, जैसा सितंबर 2024 तक कर रहा था? क्या हम इसमें हर साल औसतन कम से कम 15-20% रिटर्न की उम्मीद कर सकते हैं? यकीनन कुछ कपनियां इससे भी ज्यादा रिटर्न दे सकती हैं। लेकिन औसत की बात करें तो आगे सालाना 12% तक के रिटर्न की ही अपेक्षा हैं। खास कारण यह कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) भारत से जिस तरह विमुख हुए हैं, भारत की विकासगाथा से उनका विश्वास जिस तरह टूटा है, उसे मोदी सरकारी की चलताऊ नीतियों के फ्रेम में हाल-फिलहाल जोड़ना संभव नहीं है। इस सरकार ने आर्थिक नीतियों के साथ-साथ शिक्षा और रोज़गार के मामले में देश को भयंकर विसंगति में डाल दिया है। 15 साल में 2040 तक हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड भी खत्म हो जाएगा। अब तथास्तु में आज की कंपनी…
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