फैक्ट्रियों पर ताले, मैन्यूफैक्चरिंग चीन से

जो दिख रहा है और सरकारी विज्ञापनों में खूब दिखाया जा रहा है, वो विकास है। जो नहीं दिख रहा है, मीडिया के शोर में छिपाया जा रहा है, वो विनाश है। देश की मानव संपदा और प्राकृतिक संपदा का विनाश। भारतवर्ष, जो महज एक देश ही नहीं, पूरी सभ्यता है, वो विपुल संभावनाओं वाला राष्ट्र आज अंदर ही अंदर विखण्डित व खोखला होता जा रहा है। करीब 20 दिन पहले एक इंक निर्माता कंपनी के अधिकारी ने रेडिट पर पोस्ट लिखी कि उनके तीन मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट थे। चीन से बेहद सस्ता माल आने के कारण वे बाज़ार में पिट रहे थे। तीन साल तक घाटा खाने के बाद उन्हें अंततः कंपनी बंद करनी पड़ी और 2000 से ज्यादा कर्मचारियों को बाहर निकाल देना पड़ा। इनमें से 1934 स्थाई कर्मचारी थे, जबकि 896 लम्बे कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे थे। यह कंपनी कहां की है और इसका क्या नाम था, यह नहीं पता। लेकिन यह कोई अपवाद नहीं, बहुतों का मामला है। मोदी सरकार एक तरफ स्वदेशी का शोर मचा रही है, दूसरी तरफ स्थिति यह है कि देश का 30.8% औद्योगिक माल चीन से बनकर आ रहा है। बीते वित्त वर्ष 2025-26 में हमारा कुल आयात 774.98 अरब डॉलर था। इसका 16.98% या 131.63 अरब डॉलर का आयात अकेले चीन से हुआ था। मोदी सरकार ने भारत की मैन्यूफैक्चरिंग को दुश्मन देश चीन पर इतना निर्भर क्यों बना दिया है? अब मंगलवार की दृष्टि…

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