कोर्ट से एमसीएक्स-एसएक्स को तसल्ली, सेबी 30 सितंबर तक करे साफ फैसला

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार को पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी को निर्देश दिया कि वह 30 सितंबर तक एमसीएक्स-एसएक्स को इक्विटी ट्रेडिंग की इजाजत देने के बारे में दो टूक फैसला करे। साफ-साफ बताए कि वह इसकी इजाजत दे रही है या नहीं और नहीं तो क्यों। साथ ही कोर्ट ने एमसीएक्स-एसएक्स को भी निर्देश दिया कि वह दस दिन के भीतर अपने बोर्ड में प्रस्ताव पास करे कि एक्सचेंज में प्रवर्तकों की शेयरधारिता 5 फीसदी की सीमा के भीतर आ चुकी है। एक्सचेंज ने 20 जुलाई को दायर याचिका में हाईकोर्ट ने फरियाद की है कि उसने 7 अप्रैल 2010 को ही जरूरी शर्तें पूरी करने के बाद सेबी के पास इक्विटी ट्रेडिंग की इजाजत के लिए सेबी के पास आवेदन भेज दिया था। लेकिन सेबी ने इसे बेवजह लटका रखा है।

कोर्ट के आदेश के बाद वरिष्ठ एडवोकेट और एमसीएक्स-एसएक्स के वकील आर्यामा सी सुंदरम ने कहा, “कोर्ट ने सेबी को हर चीज पूरा करने और अंतिम फैसला देने के लिए अलग-अलग टाइमलाइन दी है। वास्तव में हम टाइमलाइन ही चाहते थे। इसलिए मुझे खुशी है कि हमें काम करने के लिए एक तरह की टाइमलाइन मिल गई है।” इससे पहले कोर्ट में सुनवाई के दौरान सुंदरम ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि एमसीएक्स-एसएक्स को इक्विटी ट्रेडिंग की इजाजत न मिलने से हर दिन 15 लाख रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

सेबी के वकील का कहना था कि उसे एमसीएक्स-एसएक्स के शेयरधारक 18 राष्ट्रीयकृत व अनुसूचित बैकों से यह जानकारी हासिल करने में कुछ वक्त लग सकता है कि स्टॉक एक्सचेंज के प्रवर्तकों ने उनके साथ किस तरह का बायबैक समझौता कर रखा है। कोर्ट ने सेबी को आदेश दिया है कि वह दस दिन के अंदर बैंकों से यह जानकारी जुटा ले। असल में सेबी की आपत्ति सारा मामला इसी मसले पर टिका हुआ है। बता दें कि एमसीएक्स-एसएक्स में उसके प्रवर्तक एमसीएक्स और फाइनेंशियल टेक्नोलॉजीज अपनी शेयरधारिता घटाकर 5 फीसदी पर ला चुके हैं। यह सेबी की आवश्यक शर्त को पूरा कर देता है।

एक्सचेंज में दो वित्तीय संस्थाओं – आईएफसीआई की हिस्सेदारी 13.23 फीसदी और आईएल एंड एफएस की 5 फीसदी है। यह भी सेबी के नियम के अनुरूप है। एक्सचेंज के शेयरधारकों में इलाहाबाद बैंक, आंध्रा बैंक, एक्सिस बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, एचडीएफसी बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, पंजाब नेशनल बैंक, पंजाब एंड सिंध बैंक, सिंडीकेट बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया व विजया बैंक समेत कुल 18 बैंक शामिल हैं जिनमें से 16 के पास एक्सचेंज के 0.46 फीसदी से लेकर 4.6 फीसदी तक शेयर हैं। बाकी दो में से यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के पास एक्सचेंज के 11.5 फीसदी और पंजाब नेशनल बैंक के पास 9.2 फीसदी शेयर हैं।

सेबी का कहना है कि एमसीएक्स-एसएक्स ने नियमों का पालन शब्दों (लेटर) में कर लिया है, लेकिन भावना (स्पिरिट) में नहीं किया है। उसका आरोप है कि एक्सचेंज ने बैंकों के साथ इस तरह का बायबैक समझौता किया है जिससे बाद में प्रवर्तक उनसे शेयर खरीद सकते हैं। दूसरी तरफ एक्सचेंज का कहना है कि उसने नियमानुसार अपनी इक्विटी 173.99 करोड़ रुपए से घटाकर 54.33 फीसदी कर दी है। इक्विटी वापस खरीदने के बदले शेयरधारकों को जो वांरट जारी किए गए हैं, उनमें कोई वोटिंग अधिकार नहीं है और किसी भी सूरत में प्रवर्तकों की हिस्सेदारी एक्सचेंज में 5 फीसदी से अधिक नहीं होगी।

जानकारों के मुताबिक सेबी कानूनी रूप से फंस चुका है। वह अभी तक एमसीएक्स-एसएक्स को इक्विटी ट्रेडिंग की इजाजत देने में देरी इसीलिए लगा रहा था ताकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के साम्राज्य को आंच न आए। लेकिन एमसीएक्स-एसएक्स के कोर्ट में चले जाने से उसके पास अब कोई चारा नहीं रह गया है और बहुत संभव है कि वह 15 सितंबर 2010 तक एमसीएक्स-एसएक्स को करेंसी डेरिवेटिव ट्रेडिंग के लिए मिली इजाजत से पहले ही कोई फैसला कर ले। एनएसई को बचाने का खास आधार यह है कि एमसीएक्स-एसएक्स के पास अच्छी टेक्नोलॉजी व कौशल है जिसके दम पर वह करेंसी फ्यूचर्स में एनएसई को पीछे छोड़ चुका है।

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