विकासशील देश में सरकार का एजेंडा विकास ही हो सकता है। लेकिन किसका विकास? लोकतांत्रिक देश में सरकार और जनता के एजेंडे में कोई फर्क नहीं होना चाहिए। भारत तो दुनिया में सबसे ज्यादा युवा आबादी वाला देश है। सालों-साल से बखाना जा रहा है कि हमारी 65% आबादी 35 साल से नीचे की है। इसे हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड भी कहा जाता है। आखिर फिर क्यों हमारे आर्थिक विकास के केंद्र में नौजवान और उसका रोज़गार नहीं है? हमने जीडीपी की नई सीरीज़ निकाल दी। उसका आधार वर्ष 2022-23 कर दिया और राष्ट्रीय खातों को अपडेट कर दिया। लेकिन न इस अपडेट में, न हमारी आर्थिक नीति, न मौद्रिक नीति और न ही राजकोषीय नीति में रोज़गार व बेरोजगारी की स्थिति कोई अहमियत दी गई है। कृषि से लेकर उद्योग-धंधों और सेवा क्षेत्र के उत्पादन व मूल्य-वर्धन का डेटा आ गया, मूल्यों व मुद्रास्फीति का डेटा आ गया, आयात-निर्यात का हिसाब हो गया, बैंकिंग, बीमा व फाइनेंस की स्थिति समझ ली गई। सब को जोड़-घटाकर जीडीपी निकाल लिया। बन गई राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और बना ली गईं आर्थिक विकास की नीतियां। लेकिन रोज़गार और बेरोज़गारी का डेटा केंद्र में तो छोड़िए, हाशिये पर भी नहीं। खुद को राष्ट्रवादी कहने वाले दल की सरकार के एजेंडा से देश की 65% ऊर्जा व जोश से भरी आबादी निर्वासित क्यों है? अब मंगलवार की दृष्टि…
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