घोषणा करने में मोदी सरकार को भारत क्या, दुनिया में कोई मात नहीं दे सकता। लेकिन घोषणाओं को ज़मीन पर उतारने में वो इतनी फिसड्डी है कि उसकी कहीं कोई मिसाल नहीं मिलती। हमारे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने करीब दो साल पहले 7 मार्च 2024 को इंडिया एआई मिशन की घोषणा की और इसके लिए 10,300 करोड़ रुपए से ज्यादी की रकम आवंटित कर दी। कंप्यूटिंग क्षमता, इनोवेशन सेंटर, डेटासेट प्लेटफॉर्म, एप्प डेवपलमेंट इनिशिएटिव, फ्यूचर स्किल्स और स्टार्ट-अप फाइनेंसिंग आदि-इत्यादि का तंत्र विकसित करने की बातें कही गईं। इसका स्पष्ट लक्ष्य था कि भारत का अपना स्वदेशी एआई हो ताकि हम विदेशी टेक्नोलॉज़ी पर निर्भर न रहें। लेकिन आज तक हम गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, ओपन एआई, ग्रोक व मेटा जैसी अमेरिकी कंपनियों और डीपसीक, किमी, डबाव, एरनी बॉट, क्लिंग व मानुस एआई जैसे चीनी कंपनियों के बनाए टूल्स पर निर्भर हैं। हम एआई के निर्माता के बजाय यूजर बनकर रह गए हैं। आज हम दुनिया के लिए एआई के सबसे बड़े टेस्टिंग ग्राउंड हैं। लेकिन हमारे पास चैट जीपीटी जैसे बड़े एआई मॉडल बनाने के लिए ज़रूरी हार्डवेयर नहीं हैं। चीन के डीपसीक ने साल भर पहले 10% से भी कम लागत में शानदार एआई टूल बनाकर दिखा दिया कि लागत कोई समस्या नहीं। बस, सरकार की राजनीतिक इच्छा-शक्ति चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…
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