भारत को अगर अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस व जापान जैसा विकसित देश बनना है या चीन, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका व इंडोनेशिया जैसा उच्च मध्यम आय का देश भी बनना है तो मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ाना होगा। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 साल पहले 2015 में कहा था कि 2025 तक जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 25% पर पहुंचा देंगे। हकीकत यह है कि यह 2011-12 में जीडीपी का 17.4% हुआ करता था। 2024-25 में घटते-घटते 13.9% पर पहुंच गया। 2025-26 के पहले अग्रिम अनुमान के मुताबिक अभी यह जीडीपी के 12.75% पर अटका रहेगा। आत्मनिर्भरता के नारे के बावजूद आज हम रोजमर्रा के उपभोग, कच्चे माल, कम्पोनेंट व अर्धनिर्मित उत्पादों के लिए चीन, विकसित टेक्नोलॉज़ी के लिए अमेरिका और ईंधन व डिफेंस के लिए रूस पर निर्भर हो गए हैं। सबसे खराब बात है कि हमारा मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र आज चीन पर निर्भर हो गया है। चीन आज हमारे फार्मा उद्योग के एक्टिव फार्मा इनग्रेडिएंट (एपीआई) का प्रमुख स्रोत है। रोजमर्रा की चीजों में हॉट वॉटर बोतल, टॉर्च, टेबल फैन व टोस्टर जैसे उत्पादों में चीन का बाज़ार हिस्सा 95% से ऊपर है। वहीं कंघी, नेल कटर, ब्रेड बोर्ड व वैक्यूम फ्लास्क में चीन का माल 97% से अधिक है। दिवाली की लड़ियों, गणेश की मूर्तियों और होली की पिचकारियों तक में चीन हावी है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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