कोई भी जीत या हार अकारण नहीं होती। अमेरिका और चीन आज अगर एआई में इतने आगे निकल गए हैं तो उसकी ठोस वजह है। भारत अगर प्रतिभाओं का विपुल भंडार रखने के बावजूद इतना पीछे छूट गया है तो इसकी व्यक्तिगत नहीं, सरकारी वजह है। अमेरिका में डार्पा (डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी) व नेशनल साइंस फाउंडेशन के साथ ही सिलकॉन वैली के वेंचर कैपिटल फंडों ने दशकों से एआई रिसर्च पर अरबों डॉलर झोंके हैं। गूगल, मेटा व माइक्रोसॉफ्ट जैसी दिग्गज टेक कंपनियों ने वैश्विक डेटा जुटाया और क्लाउड पर एकाधिकार बनाया। स्टैनफोर्ड, एमआईटी और कार्नेगी मेलन जैसे विश्वविद्यालयों के साथ ओपन एआई, गूगल ब्रेन व माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च जैसी कॉरपोरेट रिसर्च लैब्स ने एकजुट होकर काम किया। चीन में सरकार ने 2010 के दशक में ही एआई को राष्ट्रीय प्राथमिकता घोषित कर दिया और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप में भारी फंडिंग जुटाई। उसने ‘न्यू जेनरेशन एआई डेवलपमेंट प्लान’ जैसे कार्यक्रम लॉन्च किए। विशाल आबादी और वीचैट व टिकटॉक जैसे सुपर-ऐप्स ने अभूतपूर्व मात्रा में यूज़र डेटा दिया, जो एआई मॉडल ट्रेनिंग में काम आया। लेकिन भारत ने फंडिंग की भयंकर कमी रही और ट्रांसफॉर्मर आर्किटेक्चर व नए ट्रेनिंग तरीकों जैसे कोर टेक लेयर पर ध्यान नहीं दिया गया। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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